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म.प्र शासन ने जून २००५ से मार्च २००६ तक की दस माह की अवधि में प्रदेश
में विधुत आपूर्ति के लिए निजी क्षेत्र से बिजली ख़रीदी थी | जिसमें
७६०.६८ करोड़ का घोटाला उजागर हुआ है. देश के आला अफसरों की मनमानी का
अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है| इस दस माह में अल्पावधि खरीद के
अर्न्तगत कुल २१९९.३१ मिलियन यूनिट बिजली खरीदी गयी, लेकिन इसमें से
मात्र १६२.६७ मिलियन यूनिट बिजली ही टेंडर आदि के जरिये खरीदी गयी | यानी
बाकी की बिजली बिना टेंडर निकाले ही खरीदी ली गयी | आश्चर्य जनक तथ्य यह
है कि यह बिजली दोगुने से भी अधिक दाम में खरीदी गयी | जिस पर विद्युत
नियामक आयोग ने भोहे तान ली है | और अब ये मामला लोकायुक्त तक भी पहुँच
गया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बिजली खरीदी के इस मामले में
एक ही कंपनी से एक ही समय अलग अलग दरो पर बिजली खरीदी गयी | जिसमे ७६०.६८
करोड़ रूपए खर्च किये गए | ये तो सिर्फ दस माह का ही हिसाब है लेकिन यदि
इस अवधि के बाद भी इसी तरह से बिजली खरीदी गयी हो तो घोटाला ५५०० करोड़
के आसपास पहुचता है |
क्या है करोडो का खेल ? >>>> बिजली खरीदी के इस मामले में टेंडर के जरिये
सस्ती बिजली खरीदी गयी वहीं बिना टेंडर के महँगी बिजली खरीदी गयी | करोडो
की बिजली की खरीद में हुए इस भ्रष्टाचार और कमीशन बाजी का अंदाजा इसी बात
से लगाया जा सकता है कि जहाँ टेंडर के जरिये २ रूपए ९१ पैसे प्रति यूनिट
के भाव से ५५.८१ करोड़ की बिजली खरीदी गयी तो दूसरी और बिना टेंडर के ३
रूपए ४२ पैसे प्रति यूनिट की दर से ७६०.६८ करोड़ की बिजली खरीदी गयी |
करोडो का गोलमाल करने के लिए अधिकारियो ने स्पॉट रेट का सहारा लिया |
स्पॉट रेट के अर्न्तगत सितम्बर २००५ में ५.२४ करोड़ जनवरी २००६ में
१५९.२३ करोड़ ,फरवरी ०६ में १५६.३० करोड़ और मार्च ०६ में ४९ करोड़ की
बिजली बिना टेंडर के ही ली गयी बिजली खरीदी में एक ही समय में टेंडर से
सस्ती और बिना टेंडर के महँगी बिजली खरीदी गयी जो की सवालों को जन्म देता
है ?
नियामक आयोग हुआ सख्त >>>> बिजली संकट से प्रदेश को उबारने के लिए हुईं
७६०.६८ करोड़ की बिजली खरीदी पर आयोग ने कई सवाल खड़े कर दिए है उर्जा
नियामक आयोग ने बिजली खरीदी की दर को मंजूर करने से इनकार कर दिया है |
आयोग ने साफ़ तौर पर कहा कि इन सौदों में आर्थिक हितों का ध्यान नहीं रखा
गया है और न ही प्रतिस्पर्धात्मक दरें मंगाई गयी | आयोग ने सौदों की
पारदर्शिता पर भी सवालिया निशान लगाये है. आयोग का कहना है कि इस सौदे का
अंतिम असर विद्युत उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा | आयोग का यह भी कहना था कि इस
सौदे में आयोग के नियमों का उल्लंघन हुआ है | आयोग का यह भी कहना था कि
यदि प्रदेश में बिजली की इतनी आवश्यकता थी तो प्रदेश के ही बिजली घरों से
३.३० रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली ख़रीदी जा सकती थी तो फिर प्रदेश
के बाहर से ७ और ८ रुपये प्रति यूनिट के दर से बिजली खरीदने का क्या
औचित्य है ?
किसने ख़रीदी बिजली ? >>>> बिना टेंडर निकाले ७६०.६८ करोड़ की महँगी बिजली
मध्यप्रदेश ट्रेडिंग कंपनी जबलपुर ने ख़रीदी है | नियम के अनुसार
ट्रेडिंग कंपनी जितनी भी बिजली खरीदेगी उसे उसकी अनुमति बिजली बोर्ड से
लेनी होती है | बिजली बोर्ड और ट्रेडिंग कंपनी की आपसी सहमती से ही निजी
क्षेत्र से बिजली ख़रीदी जा सकती है | ऐसे में बिजली बोर्ड के अध्यक्ष व्
मुख्य सचिव और ट्रेडिंग कंपनी अध्यक्ष की कार्यशैली भी संदेह के घेरे में
आती है ?
अब सवाल यह उठता है कि जब एक समय टेंडर से सस्ती बिजली मिल रही थी तो उसी
समय बिना टेंडर उसी कंपनी से महँगी बिजली खरीदने की क्या आवश्यकता पडी ?
यही वजह है कि इस सौदे में भीतर ही भीतर अधिकारियों की सांठ गाँठ और
कमीशनबाजी की बू आ रही है |
मामला पहुंचा लोकायुक्त >>>> अब यह मामला लोकायुक्त में पहुँच गया है |
जहां विभाग के सम्बंधित अधिकारी जांच के घेरे में आ गए हैं | हालाकि आला
अफसर अभी भी मामले की लीपापोती करने और मध्यप्रदेश ट्रेडिंग कंपनी को
क्लीन चिट दिलाने के प्रयास जारी हैं |
क्या है अल्पावधि खरीद ? >>>> प्रदेश में बिजली की कमी की पूर्ति के लिए
बिजली कंपनियाँ बिजली खरीदती हैं | बिजली की यह ख़रीदी बिजली की ज़रुरत
और मांग पर निर्धारित होती है | अल्पावधि बिजली खरीद पर ऊर्जा आयोग का
कहना है कि बिजली ख़रीदी ज़्यादा ज़रुरत पर ही होनी चाहिए साथ ही यदि
ख़रीदी गई बिजली महँगी है तो उसके पर्याप्त कारण होने चाहिए | और खरीद
आयोग के नियमो के अनुसार तथा पूरी पारदर्शिता से होनी चाहिए |
किन कंपनियों से ख़रीदी बिजली ? >>>> जून २००५ से मार्च २००६ तक ट्रेडिंग
कम्पनी के कुल ६ कंपनियों से बिजली खरीदी गई | इनमे अदानी पावर, पी.टी.सी.,
एन. वी. वी. एन., टाटा, सुभाष कामिनी और रिलायंस शामिल है | इन कंपनियों
में अदानी पावर से सबसे ज्यादा फायदा देने की कोशिश की गयी है | आंकडो पर
नजर डाले तो इन दस माह में सिर्फ अदानी पावर से टेंडर के जरिये ४४.२१
करोड़ की बिजली खरीदी गयी जबकि ३४९.८४ करोड़ की बिजली बिना टेंडर के ही
खरीदी गयी | पी. टी. सी. से टेंडर के जरिये ११.६ करोड़ और बिना टेंडर के
३२१.७७ करोड़ की बिजली खरीदी गई | बाकी सभी चार कंपनियों से जितनी भी
बिजली ख़रीदी गई उसके लिए भी कोई टेंडर जारी नहीं किये गए |
प्रदेश की बिजली समस्या >>>> यू तो प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं को हमेशा
से ही बिजली की आंखमिचोली का सामना करना पड़ता है लेकिन मौजूदा हालात यही
बताते है कि प्रदेश की विद्युत परियोजनाए पूरी क्षमता से विद्युत उत्पादन
नहीं कर रही | हालाकि निजी बिजली खरीदने के लिए प्रदेश की बिजली
परियोजनाओं का उत्पादन प्रभावित करने के आरोप भी राज्य शासन पर लगते रहे
है प्रदेश की विद्युत उत्पादन क्षमता ७००० मेगावाट है | प्रदेश में जल
विद्युत और एन. टी. पी. सी. परियोजनाए अपनी पूर्ण क्षमता से उत्पादन नहीं
कर पा रही |
बहरहाल एक और म. प्र. कर्ज में डूबा है तो दूसरी और प्रदेश के आला अफसर
कमीशन बाजी और भ्रष्टाचार कर करोडो डकार रहे है | अब सवाल यह उठता है कि
७६०.६८ करोड़ की महंगी बिजली का बोझ आखिर किस पर पड़ेगा ? जाहिर सी बात है
बिजली उपभोक्ताओं पर. इस साल ६ अगस्त से उर्जा नियामक आयोग ने बिजली की
नई दरे लागू कर दी है जिससे उपभोक्ताओं पर बोझ बड़ा है अगर ट्रेडिंग कम्पनी
आयोग से अपना पक्ष सही साबित कर दे और लोकायुक्त से शीर्ष अधिकारियो को
क्लीन चिट मिल जाए तो आने वाले समय में बिजली दरो की बेतहाशा वृद्धी से
इनकार नहीं किया जा सकता | अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या करोडों डकार
लेने के बाद अपराधी अपने रुतबे के दम पर कानून की गिरफ्त से बचने में सफल
होंगे ? |