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उत्तराखण्ड सरकार ने राज्य के विभिन्न
जिलों में पर्वतीय इलाकों के सैंकड़ों हैक्टेयर क्षेत्र में फैले बुग्यालों
और बागों में उत्पन्न होने वाले दुर्लभ किस्म के फूलों के व्यवसाय को
बढ़ावा देकर पूरे हिन्दुस्तान को इन फूलों से महकाने की योजना बनाई है।
उत्तराखण्ड में दुर्लभ और सुगंधित फूलों के व्यापार के लिए दिल्ली सहित
विभिन्न राज्यों में फूलों की मण्डी की तलाश भी शुरू कर दी गई है।
उत्तराखण्ड राज्य उद्यान विभाग के अधिकारी अमर सिंह ने बताया कि फूलों की
खेती को भी राज्य में बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए फूलों की खेती करने
वाले किसानों को विशेष रूप से अनुदान भी दिया जाता है। पूरे राज्य में एक
आकलन के मुताबिक करीब दो हजार हैक्टेयर क्षेत्र में वर्तमान में फूलों की
खेती की जाती है। इसमें गेंदा, गुलाब, चांदनी तथा अन्य किस्म के फूल
शामिल हैं। उत्तराखण्ड के तीर्थ जिलों में शुमार हरिद्वार रूद्रपयाग और
चमोली में फूलों की खपत सबसे अधिक होती है। इसके साथ-साथ राजधानी
देहरादून में पूजा के अतिरिक्त विभिन्न कार्यक्रमों, राजनीतिक सम्मेलनों,
संगोष्ठियों और नेताओं के आगमन पर ही फूलों की मांग बढ़ जाती है।
उद्यान विभाग के सूत्रों ने बताया कि राजधानी देहरादून में ही अकेले
प्रतिवर्ष करीब १५ करोड़ रूपये के फूलों का कारोबार किया जाता है। इसमें
करीब एक हजार माली, किसान और फूल व्यापारी शामिल हैं। देहरादून के
पल्टनबाजार में लगने वाली फूल मण्डी के व्यापारी सुरेख कुमार ने बातचीत
में बताया कि जहां तक पूरे राज्य में फूलों के व्यापार का सवाल है तो
करीब ढाई सौ करोड़ रूपये प्रतिवर्ष व्यापार होता है। इसमें सबसे अधिक फूलों
की जरूरत हरिद्वार में पड़ती है, जहां रोज करीब छह लाख रूपये के फूलों की
बिक्री होती है। सुरेश ने बताया कि देहरादून में फूलों की सबसे अधिक मांग
बुके बनाने और विवाह के अवसर पर सजावट के समय होती है। इस अवसर पर दो सौ
रूपये प्रतिकिलो तक फूलों की बिक्री हो जाती है। आमतौर पर यह रेट ६० रूपये
से ८० रूपये किलो के बीच होता है। इस सिलसिले में राज्य में मंत्री
त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बताया कि उत्तराखण्ड के फूलों को राष्ट्रीय
स्तर पर पहुंचाने के लिए दिल्ली में अलग से एक मण्डी की तलाश की जा रही
है। इसके लिए केन्द्रीय कृषि मंत्री और दिल्ली की मुख्यमंत्री से भी
बातचीत की जा रही है।
रावत ने कहा कि इस सिलसिले में गत दिनों एक महोत्सव का भी आयोजन किया गया
था जिसमें फूलों के किसानों को खेती से संबंधित विभिन्न प्रकार की नई
तकनीकी और उपकरणों की जानकारी भी दी गई थी। रावत ने बताया कि महोत्सव के
दौरान फूलों के किसानों को कीटनाशक, संकर तकनीक, उन्नत किस्म के बीजों तथा
अन्य जानकारी प्रदान की गई। उन्होंने कहा कि राज्य में जिला पंचायत स्तर
से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक यह व्यवस्था की गई है कि फूलों के किसानों
को हर संभव सहायता मिल सके।
उद्यान विभाग के सूत्रों ने बताया कि राज्य में वर्ष २००७-०८ के दौरान
करीब ४५० हैक्टेयर जमीन को खेती के लिए तैयार किया गया था, जबकि २००८-०९
में यह करीब ५०० हैक्टेयर थी। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में उपलब्ध ६०
नर्सरियों में वर्ष २००८-०९ के दौरान अलग अलग किस्म के ३५ लाख पौधों का
उत्पादन किया गया था। इसके अतिरिक्त किसानों को सहायता देने के लिए उनके
पौधों का बीमा भी कराया जाता है। देहरादून के एक अन्य व्यापारी सुरेश्वर
प्रसाद ने बताया कि राज्य में यदि फूलों की खेती को सुनिश्चित रूप से
सहायता दी जाये तो उत्तराखण्ड अपने दुर्लभ प्रजाति के फूलों के बल पर ही
समृद्ध हो सकता है। राज्य के पहाड़ों की ऊंचाइयों पर जो फूल बिना किसी
प्रयास के अपने आप उग जाते हैं उनकी किस्में पूरी दुनिया में कहीं नहीं
मिलतीं। उन फूलों का समुचित रूप से उपयोग करके राज्य की आर्थिक स्थिति को
सुधारा जा सकता है। |