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प्राकृतिक न्याय के लिए कोर्ट जा सकते हैं नागरिक
 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन पर अन्य वैकल्पिक समाधान होने के बावजूद नागरिकों को सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में जाने का पूरा अधिकार है।

उदाहरण के लिए संवैधानिक व्यवस्था कहती है कि यदि किसी व्यक्ति को यह महसूस होता है कि संबंधित अधिकारियों ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, तो वह राहत के लिए मनोनीत अभिकरण, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।

न्यायाधीश तरुण चटर्जी व न्यायाधीश आफताब आलम की पीठ ने मरियम्मा राय की अपील को बरकरार रखते हुए यह व्यवस्था दी, जिसने केरल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की।

हाईकोर्ट ने इस आधार पर उसकी अपील को खारिज कर दिया था कि उसके पास बैंक एवं वित्तीय संस्थान अधिनियम 1993 के चलते ऋण वसूली मामले में वैकल्पिक समाधान है। मरियम्मा का ऋण वसूली के मामले में सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के साथ विवाद था।

हाईकोर्ट ने उसकी अपील को बरकरार रखते हुए कहा कि यदि कोई वैकल्पिक समाधान हो, तब भी असंतुष्ट पार्टी रिट याचिका दायर कर सकती है और यदि यह पाया जाता है कि मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है तो अदालत को इसे स्वीकार करने की शक्ति प्राप्त है।