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लालू को बरी किए जाने के मामले में फैसला सुरक्षित
 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के मामले में राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को बरी किए जाने से जुडे मामलों पर बुधवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन, आर. एम. लोढ़ा और बी. एस. चौहान की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई ने यादव दम्पती के खिलाफ मुकदमा शुरू किया था लेकिन बाद में आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने 18 दिसम्बर 2006 को उन्हें आरोप मुक्त कर दिया था।

बिहार सरकार ने इस फैसले को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। जिसके जवाब में यादव दम्पती और जांच एजेंसी सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी दलील है कि यादव को बरी किए जाने के विशेष सीबीआई अदालत के फैसले को चुनौती देने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। यादव की ओर से मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने दलील दी कि प्राथमिकी 19 अगस्त 1998 को दर्ज कराई गई थी और सीबीआई ने चार अप्रेल 2000 को आरोप पत्र दाखिल किया था।

सीबीआई की विशेष अदालत ने 16 दिसम्बर 2006 को यादव को बरी किया किया था। जेठमलानी ने कहा कि चूंकि इस मामले की जांच अभियोजन एजेंसी सीबीआई ने की थी, इसलिए विशेष पुलिस संस्थान अधिनियम के प्रावधानों के तहत केवल सीबीआई ही यादव को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दे सकती है। इस फैसले को चुनौती देने का बिहार सरकार को कोई हक नहीं है।

हालांकि राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एल. नागेश्वर राव की दलील थी कि राज्य को इस मामले में हस्तक्षेप का पूरा अधिकार है क्योंकि कथित धोखाधड़ी से राज्य के राजस्व को क्षति उठानी पड़ी है। बिहार सरकार की दलील है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की पहली सरकार में रेल मंत्री होने के कारण सीबीआई ने एक सोची समझी साजिश के तहत उनके खिलाफ मामला रफादफा कर दिया।