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कहीं मेरी बेटी दूसरी स्कारलेट हो जाए
 

एक जर्मन किशोरी के बलात्कार के मामले में गोवा के विवादास्पद शिक्षा मंत्री के बेटे रोहित को इसी महीने की दस तारीख को सशर्त जमानत मिली है। आरोपित बेटे को जमानत मिल जाने पर अदालत के बाहर मंत्री ने ललकार के अंदाज में बयान दिया कि ' मैं पहले से ही कह रहा था कि यह सब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का मामला है और इसके पीछे मेरे विरोधियों की साजिश है। '

उल्लेखनीय है कि शिक्षा मंत्री के बेटे रोहित के खिलाफ 14 साल की जर्मन बालिका ने फर्स्ट क्लास के जुडिशल मैजिस्ट्रेट के सामने बलात्कार का आरोप लगाया था। मेडिकल टेस्ट में बलात्कार की पुष्टि भी हुई थी। चूंकि यह घटना एक मंत्री के बेटे से जुड़ी थी , इसलिए स्वाभाविक ही था कि आरंभ में मामले को दबाने की कोशिश हुई। लेकिन जब यह मीडिया में आ गया , तो उससे बने दबाव के चलते 4 नवंबर को आरोपी को गिरफ्तार किया गया। पर इसी दौरान पीडि़त जर्मन किशोरी की मां ने प्रभावशाली लोगों के दबाव में जकड़ी भारत की जुडिशल सिस्टम पर अफसोस जताते हुए अपनी शिकायत वापस ले ली। पहले अपनी बेटी के अत्याचारियों को दंडित करवाने के लिए प्रयासरत रही किशोरी की मां एरिज रॉड्रिग्ज ने अचानक अपनी शिकायत वापस लेने जैसा कदम क्यों उठाया ?

इस मामले में अब तक जितने तथ्य सामने आए हैं और जो जानकारियां मिली हैं , उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि परदेस से यहां भ्रमण करने आई मां - बेटी लिए , बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने के बाद जीना मुहाल हो गया। उन्हें तरह तरह से डराया - धमकाया गया और शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डाला गया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नाम लिखी अपनी चिट्ठी में किशोरी की मां ने लिखा है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया में भुक्तभोगी के साथ अपराधी की तरह व्यवहार किया जाता है। उनका कहना है कि ' 14 अक्टूबर को जब से हमने शिकायत दर्ज कराई , तभी से हमारा जीवन नरक हो गया। मैं डरती हूं कि कहीं मेरी बेटी को भी दूसरी स्कारलेट न बना दिया जाए। ' केस वापसी के लिए भेजी अपनी अपील में एरिज लिखा है कि ' हमने यह समझ लिया है कि धनी और सत्ता - संपन्न लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करना खुद के लिए जोखिम मोल लेना है। '

जिस स्कारलेट मामले के उदाहरण से एरिज बेहद आशंकित हैं , वह इस साल फरवरी के बाद अरसे तक लगातार सुर्खियों में रहा था। स्कारलेट ब्रिटिश किशोरी थी। वह भारत घूमने आई थी और गोवा में ही बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में दोषियों को गिरफ्तार करवाने के लिए स्कारलेट की मां को काफी मशक्कत करनी पड़ी। बाद में गोवा पुलिस ने बहाना बनाकर उसके खिलाफ भी एक मुकदमा दर्ज कर दिया था।

एरिज की इस टिप्पणी की चर्चा मीडिया में भले ही बाद में हुई हो , लेकिन इस दौरान गोवा में समाज के एक धड़े ने इस सिलसिले में एक बेहद शर्मनाक अभियान चलाया गया। वहां से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक में एक बड़ा विज्ञापन छपा , जिसमें गोवा के 350 नागरिकों ने बाकायदा अपना नाम देकर जर्मन किशोरी और उसकी मां का चरित्र हनन करने वाली बहुत सी बातें प्रकाशित की हैं। बलात्कार के समूचे मामले को संदिग्ध बनाने के लिए और दोषियों को संदेह का लाभ देकर बरी करवाने के लिए पीडि़त का ही ' मीडिया ट्रायल ' करने की यह शर्मनाक कोशिश थी। हालांकि हमारे समाज में अक्सर ही बलात्कार की पीडि़त को बदचलन साबित करने की कोशिशें होती रही हैं , पर देश के इतिहास में बलात्कार के आरोपी के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए और पीडि़ता को ही दोषी साबित करने वाला यह अपनी तरह का संभवत : पहला विज्ञापन था , जो अखबार में छपा।

क्या गोवा के प्रबुद्ध समाज के उन लोगों को यह जानकारी नहीं रही होगी कि ऐतिहासिक मथुरा मुकदमा ( 1978 ) में पुलिस थाने के अंदर आदिवासी युवती का बलात्कार हुआ था और निचली अदालत ने मथुरा के चरित्र को संदिग्ध बताते हुए अपराधियों को बरी किया था , लेकिन उस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर यह बात हमेशा के लिए तय कर दी कि बलात्कार के मामले में व्यक्ति विशेष ( पीड़ित ) के चरित्र पर सवाल उठाना बिल्कुल गलत है।

लेकिन सिर्फ गोवा ही इस मामले का अपवाद नहीं है। उड़ीसा में नन के साथ हुआ बलात्कार भी एक ऐसी ही घटना है। इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि नन के साथ सार्वजनिक रूप से सामूहिक बलात्कार हुआ था। नन के साथ हुए अनाचार पर जहां राष्ट्रीय स्तर पर चिंता प्रकट की जा रही है , वहीं दूसरी तरफ उड़ीसा के दो अखबारों ने समूचे मामले को विवादास्पद बनाने के लिए एक मुहिम सी छेड़ दी। इन अखबारों ने बलात्कार की प्रमाणिकता पर संदेह प्रकट करने वाले लेख छापे। मीडिया का कोई भी अंग किसी भी कांड की निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए स्वतंत्र है , लेकिन बलात्कार के मामले में जिन तर्कों का उन अखबारों ने सहारा लिया है , वे स्पष्ट रूप से स्त्री विरोधी हैं और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा तय मानदंडों का उल्लंघन करते हैं। अपनी रिपोर्टों में उन्होंने पीडि़ता को ' संभोग का आदी ' बताया है और चरित्रहीन के तौर पर चित्रित किया है।

असल में , कानून में संशोधन एक बात है और समाज की मानसिकता में बदलाव बिल्कुल दूसरी बात। कानूनी संशोधनों के बावजूद भारतीय मानस आज भी यह बात पचा नहीं पाता कि बलात्कार के अपराध का पीडि़ता के चरित्र से कोई लेनादेना नहीं होता। यदि किसी महिला ने दूसरों से शारीरिक संपर्क कायम किया हो , तो भी इससे बलात्कार के अपराधी का अपराध कम नहीं होता। इससे संबंधित कानून में 1983 में संशोधन कर बलात्कार को यौन हिंसा माना गया है। महिलाओं , महिला संगठनों और दूसरे कई प्रगतिशील संगठनों ने हमेशा मांग की है बलात्कार को चरित्र से जोड़ कर नहीं देखा जाए। ये बातें सिर्फ अपराध को छिपाने , दोषी का अपराध कम करने या उसे बचाने के लिए ही उठाई जाती हैं।

जाहिर है कि समाज को अपनी रूढ़ हो चुकी यह मानसिकता बदलने और कानून को अपना काम करने की छूट देने की जरूरत है। अन्यथा देश में अनगिनत बेटियों को स्कारलेट जैसे अंजाम से बचाना मुश्किल होता जाएगा।