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26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद दक्षिण एशिया के
दो सबसे बत्रडे और परमाणु हथियार सम्पन्न देशों भारत व पाकिस्तान के मध्य
युद्ध के बादल मंडराते नज़र आने लगे हैं। मुम्बई पर हमला करने वाले
आतंकवादी पाकिस्तान के ही नागरिक थे यह अब कोई भारत की ओर से लगाया जाने
वाला आरोप मात्र नहीं रह गया है। अब तो अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा स्वयं
पाकिस्तान के कई प्रमुख नेताओं व मीडिया ग्रुप द्वारा भी यह बात स्वीकार
की जा रही है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा मुम्बई में गिरफ्तार
किया गया एकमात्र आतंकवादी अजमल आमिर क़साब पाकिस्तान का ही नागरिक है।
अजमल ने स्वयं भारत स्थित पाक दूतावास को अपने पाकिस्तानी होने की पूरी
दलील देते हुए क़ानूनी सहायता की भी मांग की है। परन्तु बत्रडे अफ़सोस की
बात है कि पाकिस्तान की हुकूमत सच्चाई का साथ देने के बजाए झूठी व गुमराह
करने वाली दलीलों का सहारा लेकर दोनों देशों के मध्य तनाव की स्थिति पैदा
कर रही है। 2001 में संसद पर हुए हमले के बाद दोनों देशों के बीच जिस
प्रकार के हालात पैदा हो गए थे लगभग वैसे ही दुर्भाग्यपूर्ण हालात बनने
पुन: शुरु हो चुके हैं।
अब पूरे विश्व की निगाहें इस बात पर जा टिकी हैं कि भारत व पाकिस्तान के
बीच मुम्बई हमलों के बाद तेज़ी से बिगत्रडते जा रहे वर्तमान हालात कहीं
युद्ध का रूप न धारण कर लें। भारत की ओर से विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी
द्वारा बार-बार यह दोहराया जा रहा है कि भारत के सामने पाकिस्तान से
निपटने के लिए हमारे सभी विकल्प खुले हैं। भारतीय रक्षा मंत्री ने भी
भारतीय सेना को सतर्क रहने हेतु कहा है। यहां तक कि सर्वोच्च भारतीय
सैन्य अधिकारियों के हवाले से भी कहा जाने लगा है कि भारतीय सेना हर
प्रकार से तैयार है। भारतीय थल सेनाध्यक्ष द्वारा भारत-पाक सीमांत
सियाचीन क्षेत्र का दौरा भी किया जा चुका है। उधर पाकिस्तान की ओर से भी
आत्मरक्षा हेतु तैयार रहने की बातें की जाने लगी हैं। परन्तु इन सबके
बावजूद भारत-पाक सीमा पर फ़िलहाल किसी अतिरिक्त सैन्य हलचल का न होना भी
इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि भारतीय विदेश मंत्री द्वारा सभी विकल्प
खुले होने की बात बार-बार दाहेराए जाने का अर्थ सैन्य कार्रवाई ही नहीं
बल्कि पाकिस्तान पर और अधिक अन्तर्राष्ट्रीय दबाव डालना अथवा संयुक्त
राष्ट्र में पाकिस्तान पर कुछ नए प्रतिबंध लगाए जाने की मांग करना जैसी
बातें भी हो सकती हैं।
दोनों देशों के मध्य तनावपूर्ण वातावरण में यह बात अवश्य संतोषपूर्ण है
कि दोनों ही देशों की सरकारों की ओर से यह महसूस किया जा चुका है कि
आतंकवादियों का मक़सद भारत व पाकिस्तान के मध्य चल रही शांति वार्ता में
विघ्न डालना है। आतंकवादियों द्वारा पहले तो भारत के कई प्रमुख धर्मस्थलों
को निशाना बनाया गया। इसके पीछे उनकी नापाक मंशा यह थी कि भारत में
साम्प्रदायिक तनाव बत्रढे तथा यह इस क़द्र बत्रढे कि देश में दंगे व फ़साद
तक की नौबत आ जाए। परन्तु भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द्र की जत्रडें
इतनी गहरी हैं कि आतंकवादी अपने इन नापाक मंसूबों में कामयाब नहीं हो सके।
भारत की सहनशील जनता रघुनाथ मंदिर, अक्षरधाम मंदिर तथा संकटमोचन मंदिर
जैसे प्राचीन एवं ऐतिहासिक धर्मस्थलों पर सीमा पार से आए आतंकियों द्वारा
किए गए नापाक हमलों को देखती रही। उसके पश्चात मानवता के इन दुश्मनों ने
भीत्रड भरे बाज़ारों को अपना निशाना बनाना शुरु किया। दीपावली व ईद जैसे
पवित्र त्यौहारों के अवसर पर ख़रीद फ़रोख्त्रत कर रहे निहत्थे व बेक़ुसूर
लोगों को अपना निशाना बनाकर इन राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों ने अनेकों बार
भारतीय समाज को विचलित करने का कार्य किया। परन्तु धन्य है अथाह सहनशक्ति
रखने वाला भारतीय समाज जोकि इन सब आतंकी कार्रवाईयों के बावजूद विचलित
अथवा आक्रामक होने के बजाए अपनी ही सुरक्षा ख़ामियों में कमियां तलाशता रहा।
एक ओर तो दुनिया सीमा पार से प्रोत्साहित होने वाले आतंकवादियों के भारत
पर लगातार हो रहे हमलों को देखती रही तो दूसरी ओर भारत व पाकिस्तान के
मध्य शासकीय स्तर पर संबंध मधुर व मज़बूत बनाने की कोशिशें भी साथ-साथ चलती
रहीं। परन्तु 13 दिसम्बर 2001 को तो भारत के स्र्र का पैमाना उस समय गोया
छलकने को हो गया जबकि पाकिस्तान की धरती से प्रशिक्षित होकर आए पाक
नागरिकता रखने वाले आतंकवादियों ने भारतीय संसद भवन पर अचानक धावा बोल
दिया। उस समय भी पाकिस्तान किसी भी क़ीमत पर यह मानने को तैयार नहीं हो रहा
था कि भारतीय संसद भवन पर आतंकी हमले में मारे गए आतंकवादी पाकिस्तानी
हैं। परिणामस्वरूप उस समय हालात इतने बिगत्रड गए थे कि दोनों देशों के
राजदूत वापस बुला लिए गए थे। दोनों देशों के मध्य यातायात के साधन बंद कर
दिए गए थे। यहां तक कि दोनों ओर की सेनाएं भी मोर्चा संभाल कर आमने-सामने
डट गई थीं। परन्तु दोनों ही देशों के शासकों की सूझबूझ तथा
अन्तर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप युद्ध टल गया तथा मोर्चे पर
तैनात अतिरिक्त सेनाएं अपनी बैरकों में वापस आ गईं।
उपरोक्त घटना से लेकर अब तक के दुनिया के विशेषकर दक्षिण एशिया के हालात
काफ़ी बदले हुए हैं। अमेरिका द्वारा 11 सितम्बर के हादसे के बाद आतंकवाद
के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की जा चुकी है। अपने इसी मिशन के तहत अमेरिकी
सेना ने तालिबानी आतंकवाद को ख्त्रात्म करने के मक़सद से अफ़ग़ानिस्तान में
प्रवेश किया था। अमेरिका के आतंकवाद विरोधी इस मिशन में पाकिस्तान,
अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है। अफ़ग़ानिस्तान व पाकिस्तान सीमा पर क़बाईली
क्षेत्रों में पुन: बत्रढ रहे तालिबानी प्रभाव को समाप्त करने के लिए
अमेरिकी व पाकिस्तानी सेना संयुक्त रूप से प्रयास कर रही है। इन हालात के
बीच जिस प्रकार मुम्बई पर पाकिस्तान की धरती से आए आतंकवादियों द्वारा
जिस अंदाज़ का तथा जिस तीव्रता का हमला किया गया है, उसने पूरे भारतवासियों
के स्वाभिमान को हिलाकर रख दिया है। भारतीय जनता में मुम्बई हमलों से उपजे
आक्रोश का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय गृहमंत्री,
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री तक को मुम्बई हमलों के
परिणामस्वरूप अपनी कुर्सी तक गंवानी पत्रडी है। मुम्बई हमलों के बाद भारत
अब पकिस्तान की धरती से आने वाले किसी भी आतंकवादी को भारत की सरज़मीं पर
ख़ूनी खेल खेलने की और इजाज़त देने के हक़ में नहीं है। भारत सरकार द्वारा
अपनी सुरक्षा एजेंसियों के आधुनिकीकरण, मंत्रिमंडल में की गई फेरबदल,
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के बदले जाने से लेकर आतंकवाद विरोधी नए
क़ानून बनाए जाने तक सभी ऐसे उपाय किए जा रहे हैं जिससे कि देश को भविष्य
के किसी भी संभावित आतंकवादी हमले से बचाया जा सके।
उधर पत्रडोसी देश पाकिस्तान की भी सूरते-हाल भारत से कम दयनीय नहीं हैं।
पाकिस्तान में पलने, पोसने तथा प्रशिक्षण पाने वाला यह आतंकवादी नेटवर्क
पाकिस्तान को भी नहीं बख्त्रश रहा है। बेनज़ीर भुट्टो की हत्या, पूर्व
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ तथा नवाज़ शरीफ़ पर हुए जानलेवा हमले, मैरियट
होटल को भीषण आत्मघाती वाहन से उत्रडाया जाना, डेनमार्क दूतावास पर किया
गया हमला और ऑप्रेशन लाल मस्जिद में धर्म का लिबादा ओत्रढे हथियारबंद
आतंकवादियों की धरपकत्रड स्वयं इस बात का सुबूत है कि पाकिस्तान में अपनी
जत्रडें गहरी कर चुके आतंकवादी संगठन संभवत: अब पाक हुकूमत के नियंत्रण
से बाहर हो चुके हैं। यही वजह है कि पाकिस्तानी हुक्मरान भारत में
पाकिस्तान की धरती से की जाने वाली आतंकी घुसपैठ के जवाब में बार-बार यही
दुहाई देते नज़र आते हैं कि पाकिस्तान स्वयं आतंकवाद से प्रभावित है।
उधर आतंकी गतिविधियों पर नज़र रखने वाले विशरूेषक यह मानते हैं कि अब
आतंकवादियों की मंशा भारत व पाकिस्तान के मध्य इस हद तक तनाव फैलाने की
है कि यह दोनों देश न सिर्फ़ अपने शांतिपथ से पीछे खिसक जाएं बल्कि संभव
हो तो युद्ध के मुहाने तक भी चले आएं। जानकार सूत्रों का मानना है कि
अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान सीमा पर अमेरिका के सहयोगी के रूप में तालिबानी
आतंकियों से मोर्चा ले रही पाक सेना को यदि अचानक भारतीय सीमा पर भी
युद्ध का मोर्चा खोलना पत्रडा तो ऐसे में पाक सेना के समक्ष दो ही विकल्प
होंगे। एक तो यह कि पाक सेना दोनों मोर्चों पर एक साथ तैनात रहे। और दूसरा
यह कि वह अमेरिकी सेना का साथ छोत्रडकर भारत-पाक सीमा पर आकर मोर्चा
संभाले। इन दोनों ही परिस्थितियों में आतंकवादी संगठन सामूहिक रूप से
पाकिस्तान में स्थित परमाणु हथियार केंद्रों पर अपना क़ब्ज़ा जमाने का
प्रयास करेंगे। उधर यदि अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर अमेरिकी सेना को पाक सेना
अकेले छोत्रडती है तो वह परिस्थिति भी अमेरिकी सेना के लिए ठीक नहीं होगी।
ज़ाहिर है इन सभी संभावित हालात से भारत-पाकिस्तान व अमेरिका सभी भली-भांति
वाक़िफ़ हैं।
ऐसे में निष्कर्ष यही निकलता है कि भारत द्वारा समस्त विकल्प खुले रहने
की बार-बार बात करने का अर्थ कुछ भी हो परन्तु संभवत: युद्ध नहीं हो सकता।
क्योंकि युद्ध का अर्थ आतंकवादियों की उसी मंशा को पूरा करना है जिससे कि
भारत अब तक बचता आया है। हां इतना ज़रूर है कि पाकिस्तान में नासूर का रूप
धारण कर चुके इस आतंकी नेटवर्क को पाकिस्तान ने अपने अकेले दम पर अथवा
अमेरिकी सहयोग से या फिर भारत के साथ मिलकर पूरी शक्ति तथा पूरी
पारदर्शितिा से जत्रड से उखात्रड फेंकने का कार्य यदि यथाशीघ्र नहीं किया
तो पाकिस्तान को यह आतंकवादी किसी भी निम्न से निम्न स्तर तक पहुंचा सकते
हैं। जैसा कि अभी एक झलक भी देखने को मिली थी कि इन्हीं आतंकियों के चलते
पाकिस्तान आतंकवादी राष्ट्र घोषित होने से बाल-बाल बचा। एक पत्रडोसी
राष्ट्र होने के नाते हम भारत के लोग तो पाकिस्तान के उज्जवल भविष्य की,
वहां शांति और ख़ुशहाली की कामना ही कर सकते हैं परन्तु इसके लिए वहां
आतंकवादी नेटवर्क का यथाशीघ्र जत्रड से सफ़ाया होना अत्यंत आवश्यक है।
तनवीर जाफ़री |