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बराक हुसैन
ओबामा की विजय अमेरिकी इतिहास की विलक्षण घटना है। यह वास्तव में अमेरिका
का पुनर्जन्म है। अब्राहम लिंकन के बाद अमेरिका जड़ हो गया था। समता की
फिल्म इतिहास के पर्दे पर ही अटक गई थी। 50 साल पहले मार्टिन लूथर किंग
ने उसे हिलाया-डुलाया जरूर लेकिन उसे चलाने की चाबी अब बराक ओबामा के हाथ
लगी है। इसीलिए ओबामा सिर्फ अमेरिका के 44 वें राष्ट्रपति ही नहीं होंगे,
इतिहास-पुरूष भी होंगे। राष्ट्रपति के तौर पर वे कोई क्रांति कर देने का
दम नहीं भर रहे हैं लेकिन उनका व्हाइट हाउस में होना अपने आप में एक मौन
क्रांति है। ओबामा के नाना-नानी चाहे गोरे रहे हों, माँ भी गोरी रही हो
और लोग उन्हें अफ्रीकन-अमेरिकन कहकर संबोधित करते रहे हों लेकिन यह सत्य
एवरेस्ट पर गड़ी पताका की तरह लहरा रहा है कि वे काले हैं। उनके पिता का
जन्म केन्या में हुआ था और उनकी माँ के दूसरे पति इंडोनेशियाई थे और
मुसलमान थे। पिछले सवा दो सौ साल के इतिहास में क्या अमेरिका में कोई
राष्ट्रपति ऐसा हुआ है, जिसकी पृष्ठभूमि इतनी विविध और जटिल हो ? जैसे
ओबामा बाल्यकाल में दस साल तक इंडोनेशिया में रहे और इस्लामी मज़हब और
हिंदू संस्कृति से ओत-प्रोत हुए, क्या कोई अन्य राष्ट्रपति हुआ है ?
विश्व-सिंहासन पर विराजमान होनेवाला ओबामा ऐसा पहला नेता होगा, जिसके जेब
में सदा हनुमान की मूर्ति रहती है और दफ्तर की दीवार पर महात्मा गाँधी
सुशोभित होते हैं।
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41 वर्षीय ओबामा के व्यक्तित्व की यह रूपरेखा आशा जगाती है कि वे थियोडोर
रूज़वेल्ट, आइज़नहावर, रिचर्ड निक्सन, लिंडन जॉन्सन और जार्ज बुश की तरह
अहमन्य और संकीर्णमना राष्ट्रपति नहीं होंगे। उनकी दृष्टि उदार होगी और
वे सारी दुनिया को अमेरिकी छाते के नीचे धकेलने की कोशिश नहीं करेंगे।
आर्थिक संकट में फँसा अमेरिका यदि अब भी एकधु्रवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था
लादने पर आमादा रहेगा तो न केवल वह खुद का नुकसान करेगा बल्कि दुनिया में
तबाही के एक नए दौर की शुरूआत करेगा। ओबामा को यह नहीं भूलना चाहिए कि
उनकी विजय उनकी उम्र, योग्यता, अभियान-कौशल आदि के कारण अवश्य हुई है
लेकिन बुश के कारण भी हुई है। बुश ने अपनी दोनों अवधियों में सारे संसार
पर अमेरिका को थोपने की जो कोशिश की है, उसने अमेरिका की अच्छाइयों पर
पर्दा डाल दिया और उसे सर्वत्र घृणा का पात्र बना दिया। अमेरिका जनता को
बुश ने आर्थिक संकट में फँसा दिया। बेचारे मैककैन को बुश का क्रॉस ढोना
पड़ा। ओबामा चाहें तो अमेरिकी विदेश नीति ही नहीं, विश्व-राजनीति को भी
रचनात्मक दिशा दे सकते हैं।
यह ठीक है कि चुनावी भाषणों को, जीतने के बाद, नीतियों में बदल देना आसान
नहीं होता लेकिन ओबामा से उम्मीद की जाती है कि राष्ट्रपति के रूप में वे
ऐसी नीतियों का सूत्रपात करेंगे, जिससे अमेरिकी समाज में खिंची रंगभेद की
खाई पटने लगे। आज भी अमेरिका के काले, हिस्पानी और अश्वेत लोग, जिनकी
संख्या लगभग 30 प्रतिशत है, घोर विषमता, गरीबी और उपेक्षा के शिकार हैं।
ओबामा के राष्ट्रपति बनने से उनके मन में आशा की एक तेज किरण फूटी जरूर
है लेकिन किरण के चाँदनी बनने का फासला बहुत लंबा है। इस लंबाई को घटाने
में डेमोक्रेटिक पार्टी को सीनेट और
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प्रतिनिधि सदन में मिलनेवाले बहुमत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। अमेरिका
के अंदर ही नहीं, ओबामा को यूरोप में भी लाखों श्रोताओं ने सुना है।
अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमेरिका की सहानुभूति उनके साथ है। फिदेल
कास्त्रो ने उन्हें बधाई दी है। इस अपूर्व विश्व-सहानुभूति के आधार पर वे
अमेरिका को नए रूप में ढाल सकते हैं।
जहाँ तक अमेरिका के आर्थिक संकट का सवाल है, ओबामा के पास जादू की कोई छड़ी
नहीं है। भोगवाद में डूबे अमेरिका को वे कौनसी आध्यात्मिक बेसाखी पकड़ाएँगे
? खरबों डॉलर के कर्ज में डूबे अमेरिकियों को, ऋण करो और घी पीओ की सभ्यता
में विश्वास करनेवालों को वे यदि त्याग और बचत का उपदेश देंगे तो शीघ्र
ही अलोकप्रिय हो जाएँगे। ओबामा की चुनौतियाँ लिंकन की चुनौतियों से कम नहीं
हैं लेकिन आशा की किरण यही है कि बाल्यकाल में अनाथ का जीवन बितानेवाले
ओबामा पूंजीवाद की चकाचौंध में मस्ता रहे अमेरिकियों को ज़रा कमर कसने का
आह्वान कर सकेंगे। वे अमेरिकियों को ज़रा बताएँ कि उनकी जेबें भरने के लिए
ही बुश ने एराक़ पर हमला किया था। सद्दाम के विध्वंसकारी हथियारों के कारण
नहीं, सस्ते तेल के कारण अमेरिका एराक़ के दलदल में फँस गया है। अरबों
डालर और सैकड़ों सैनिकों को खोकर भी बुश ने कोई सबक नहीं सीखा। अब यह सलीब
ओबामा के कंधे पर आ गया है। एराक से अमेरिकी फौजों की वापसी क्या आसानी
से हो सकेगी ? ओबामा अपना वादा कैसे पूरा करेंगे ?
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बारे में ओबामा का सोच बिल्कुल सही है। जब
तक तालिबान के विरूध्द ज़ोरदार अभियान पूरी ताकत से नहीं चलेगा,
अफगानिस्तान अमेरिकी इज्जत की कब्रगाह बनता चला जाएगा। पाकिस्तानी सरकार
में वह माद्दा नहीं कि वह अपने कबाइली क्षेत्रों को काबू कर
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सके। अमेरिकी फौज को सीधी कार्रवाई के लिए तैयार होना होगा। अपना काम पूरा
करके अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें शीघ्रातिशीघ्र वापस हों, यह देखना
ओबामा की जिम्मेदारी होगी। अगर अमेरिकी फौजें एराक़ और अफगानिस्तान में
फँसी रहीं तो अमेरिका नए-नए आर्थिक संकटों में फँसता चला जाएगा। जैसे
अफगानिस्तान पर हुए सोवियत कब्जे ने साम्यवादी व्यवस्था को चरमरा दिया,
वैसे ही अमेरिकी पूंजीवादी व्यवस्था भी भरभरा सकती है। ओबामा अगर ईरान को
धमकियाँ देने की बजाय बातचीत का रास्ता पकड़ें तो उन्हें अपूर्व सफलता
मिलेगी। तीस साल से बंद पड़े ताले खुल उठेंगे।
ओबामा ने अपने चुनाव-अभियान में भारत के प्रति विशेष मैत्री-संकेत दिए
हैं। उनके अभियान में प्रवासी भारतीयों ने जमकर सहयोग भी किया है। लेकिन
उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे परमाणु-सौदे के बहाने भारत पर अनावश्यक
शर्ते थोपने की कोशिश नहीं करें। उन्होंने हाइड एक्ट बनवाने में विशेष
भूमिका अदा की थी लेकिन अब उन्हें अपने परमाणु सामंतवाद या परमाणु
अप्रसारवाद पर थोड़ी लगाम लगानी होगी। उन्होंने पाकिस्तान को सही सलाह दी
है कि उसे भारत से कोई खतरा नहीं है। आतंकवाद ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन
है। वे राष्ट्रपति के तौर पर इसी नीति को चलाएँ तो दक्षिण एशिया में
अमेरिका नीति काफी सफल हो सकती है। भारत को क्षेत्रीय महाशक्ति स्वीकार
कर लेने पर अमेरिका को अनेक आर्थिक और सैनिक लाभ स्वत: ही मिलने लगेंगे।
कश्मीर का सवाल बहुत नाजुक है। ओबामा को फूंक-फूंककर कदम रखना होगा। यदि
बुश ने इस मुद्दे पर परिपक्वता का परिचय दिया है तो ओबामा से तो काफी
चतुराई की उम्मीद की जाती है। ओबामा चाहें तो दक्षिण एशिया में अमेरिकी
नीतियों का पुनर्जन्म हो सकता है। भारत में जो दर्जा कभी सोवियत संघ को
प्राप्त था, वह अमेरिका को मिल सकता है।
डॉ. वेदप्रताप वैदिक |