Home

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
कहां से मिलती है आत्मघाती हमलावरों को प्रेरणा
 

पाकिस्तान की राजनीति से परवेज़ मुशर्रफ़ की बिदाई या हुई कि वहां आत्मघाती हमलों की झड़ी सी लग गई है। पिछले दिनों मात्र तीन दिनों के भीतर तीन बड़े आत्मघाती हमले पाकिस्तान में अंजाम दिए गए। मुशर्रफ़ की बिदाई के अगले ही दिन क्े अगस्त को पाकिस्तान के पश्चिमाोर सीमांत प्रांत के डेरा इस्माईल ख़ां में बड़े ही सुनियोजित ढंग से एक बड़ा आत्मघाती हमला किया गया। वहां पहले अज्ञात मोटर साईकिल सवारों द्वारा शिया समुदाय के एक व्यक्ति को गोली मारी गई। जब उस घायल व्यक्ति को स्थानीय ज़िला सिविल अस्पताल में ले जाया गया तथा उसके पीछे भारी भीड़ व पुलिसकर्मी अस्पताल पहुंचे ठीक उसी समय उसी भीड़ में शामिल होकर एक आत्मघाती हमलावर ने स्वयं को भारी विस्फ़ोट से उड़ा दिया। परिणामस्वरूप ख्भ् व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए। मृतकों में अधिकांश लोग शिया समुदाय से संबंधित थे जबकि कई पुलिस वाले भी इस हमले में मारे गए। डेरा इस्माईल ख़ां में इससे पूर्व भी कई आत्मघाती हमले हो चुके हैं।
दूसरा बड़ा तांजातरीन आत्मघाती हमला 21 अगस्त को इस्मालाबाद से मात्र से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हथियार बनाने वाली एक सरकारी ंफैक्ट्री में हुआ। यहां हमलावरों ने 2 अलग-अलग विस्ंफोट हथियार ंफैक्ट्री के दो अलग-अलग मुख्य द्वार पर उस समय किए जबकि बड़ी संख्या में ंफैक्ट्री के कर्मचारी अपना काम समाप्त करने के बाद मुख्य द्वार से बाहर निकल रहे थे। मात्र 30 सेकेंड के अंतराल में हुए इन हमलों में 75 लोग तो मौंके पर ही मारे गए जबकि 100 से अधिक लोगों के गम्भीर रूप से घायल होने का भी समाचार है। इन आत्मघाती हमलों की ंजिम्मेदारी पाकिस्तान में ही रह रहे तालिबान प्रवक्ता मौलवी उमर द्वारा स्वीकार की गई है। इस तालिबानी प्रवक्ता का कहना है कि पाक अंफंगान सीमा के ंकबाईली क्षेत्रों में पाक सेना द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई के विरोध में यह हमले किए गए हैं। तालिबानी प्रवक्ता ने कहा कि यह आत्मघाती हमला बाजौर में हुई बेगुनाह महिलाओं व मासूम बच्चों की मौत का बदला है। ज्ञातव्य है कि पाक सेना ने नाटो सेनाओं के साथ मिलकर पाकिस्तान-अंफंगानिस्तान सीमा के निकट के ंकबाईली क्षेत्र विशेषकर बाजौर व उसके आसपास के क्षेत्रों में अगस्त के दूसरे सप्ताह में 4 दिनों के भीतर सौ से अधिक तालिबानी चरमपंथी मार गिराए थे। तालिबान विरोधी इस सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तानी सेना के 9 सैनिक भी मारे गए थे।
प्रश् यह है कि आत्मघाती विस्ंफोट करने की प्रेरणा इन हमलावरों अथवा इनके आंकाओं को कहां से प्राप्त होती है। यह किसी रूढ़ीवादी धार्मिक शिक्षा का परिणाम है अथवा किसी जुनून की पराकाष्ठा? आंखिर इतना बड़ा वहशीपन किसी आत्मघाती हमलावर के भीतर कैसे अपनी जगह बना पाता है? यदि हम आत्मघाती हमलावरों के इतिहास पर नंजर डालें तो सर्वप्रथम 1980 में आत्मघाती दस्ते गठित किए जाने का सिलसिला शुरु हुआ। इसका सबसे बड़ा सफल परीक्षण 1983 में उस समय किया गया जबकि बारूद से भरे एक ट्रक को एक आत्मघाती हमलावर ने बेरुत में एक बड़े एवं अतिसुरक्षित भवन से टकरा दिया। इस आत्मघाती ट्रक विस्ंफोट में 300 लोग मारे गए जबकि सैकड़ों लोग घायल हो गए। यह हमला अमेरिका व ब्रिटिश सेनाओं को चेतावनी देने हेतु किया गया था। दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में कहीं विद्रोह करने वाले तो कहीं कथित रूप से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले हथियारबंद संगठनों को अपने भारी भरकम दुश्मन से लड़ने का यह उपाय पसंद आया। उसके पश्चात आत्मघाती हमलों की यह रणनीति लंका के तमिल टाईगर्स व ंफिलिस्तीन के हमास जैसे हथियारबंद संगठनों द्वारा अपनाई गई। तत्पश्चात जैसे-जैसे इन आत्मघाती हमलों के सकारात्मक परिणाम हमलावरों तथा विद्रोहियों को नंजर आते गए वैसे-वैसे ऐसे आत्मघाती हमलों में इंजांफा होता गया।
आत्मघाती हमलों से इस समय विश्व के लगभग 30 देश प्रभावित हैं अथवा इन देशों पर आत्मघाती हमलों जैसे ंखतरे के बादल मंडरा रहे हैं। मुख्य रूप से इंजराईल, ंफिलिस्तीन, इरांक, अंफंगानिस्तान, श्रीलंका व पाकिस्तान जैसे देशों में इन दिनों आत्मघाती हमलावर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं तथा इन्हीं देशों में इन आत्मघाती हमलावरों को आत्मघाती हमला करने हेतु मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है। भीड़भाड़ वाले आसान लक्ष्य को निशाना बनाने के लिए चलता-फिरता एक अकेला आत्मघाती हमलावर अपना काम अंजाम दे सकता है। जबकि अतिसुरक्षित एवं चाक चौबंद चौकसी से भरपूर तथा बैरीकेड लगे क्षेत्रों को उड़ाने के लिए विस्ंफोट से भरी कार अथवा ट्रक को आत्मघाती हमलावरों द्वारा स्वयं चालक के रूप में विस्ंफोट स्थल से टकरा दिया जाता है। बहुत कम ही परिस्थितियों में ऐसे आत्मघाती हमलों को रोक पाना सम्भव हो पाता है। आत्मघाती हमलों के इस भयावह व दर्दनाक इतिहास में अब तक जहां हंजारों जानें जा चुकी हैं, वहीं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी तथा श्रीलंका के राष्ट्रपति राणासिंघे प्रेमदास जैसे महान नेता भी ऐसे ही आत्मघाती हमलों की भेंट चढ़ चुके हैं।
आत्मघाती हमलावरों की मनोस्थिति के विषय में तथा इनके इस हद तक के जुनून के बारे में विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। अधिकांश लोगों का यह मानना है कि अमेरिकी व उसकी सहयोगी सेनाओं द्वारा विभिन्न देशों में की जा रही ज्याद्ती के परिणामस्वरूप आत्मघाती हमलों का यह सिलसिला शुरु हुआ जोकि आज तक जारी है। बेरुत जैसे 1983 के सफल आत्मघाती मिशन के बाद इस रणनीति को अन्य विद्रोहियों द्वारा अपनाया जाने लगा। जबकि कुछ लोगों का यह मानना है कि इस्लाम धर्म के इतिहास में पाई जाने वाली शहादत की तमाम घटनाएं इन आत्मघाती हमलावरों को प्रेरणा देती हैं। परन्तु तमिल टाईगर्स जैसे ंगैर इस्लामी आत्मघाती हमलावरों को देखने के बाद यह दलील सटीक नहीं बैठ पाती। हां यह ंजरूर माना जा सकता है कि अमेरिका व उसके सहयोगी देशों की सेनाओं के विरोधस्वरूप ऐसे (आत्मघाती) हमले न सिंर्फ शुरु हुए थे बल्कि इसी कारण यह हमले बढ़ते भी जा रहे हैं। इरांक में आज जितने भी आत्मघाती हमले सुनाई दे रहे हैं उनमें अधिकांश हमलों के पीछे की मंशा यही है कि किसी प्रकार अमेरिका व उसकी सहयोगी सेनाएं इरांक से बाहर निकल जाएं तथा इरांकियों को उनके अपने देश में आंजादी से जीने दें।
रहा सवाल इस्लामी प्रेरणा का तो इस्लाम में कहीं भी ऐसा आत्मघाती हमला न तो किसी ने किया है न ऐसा हमला करने की किसी धर्मगुरु ने प्रेरणा दी है और न ही किसी इस्लामी धर्मशास्त्र में ऐसे वीभत्स एवं अमानवीय हमलों का उल्लेख मिलता है। सत्य के लिए अपनी जान न्यौछावर कर देने तथा असत्य के आगे अपने घुटने कभी न टेकने जैसी प्रेरणा अवश्य इस्लाम देता है। बेगुनाह और निहत्थे लोगों को निशाना बनाए जाने जैसी प्रवृत्ति पूरी तरह से ंगैर इस्लामी ही नहीं बल्कि इस्लाम विरोधी भी है। आज यदि जेहाद, जन्नत अथवा इस्लाम के नाम पर चंद गुमराह आतंकवादी संगठनों द्वारा ंगरीब बच्चों को व युवकों को आत्मघाती हमला करने हेतु तैयार किया जाता है तो यह सवाब (पुण्य) नहीं बल्कि गुनाह-ए-कबीरा (महापाप) है। इस्लाम तो अप्राकृतिक मौत को ही पसन्द नहीं करता फिर आंखिर आत्मघाती हमलावर जन्नती या स्वर्ग का दावेदार कैसे और क्योंकर हो सकता है। ऐसा हमलावर अप्राकृति रूप में अपनी जान देने जैसा पाप एवं अपराध तो करता ही है, साथ-साथ दूसरे बेगुनाहों की हत्या का भी वही शख्स दोषी होता है। और उससे बड़े दोषी हैं वे कट्टरपंथी और रूढ़ीवादी तथाकथित धर्मगुरु जो ऐसे हमलावरों को मौत के बदले जन्नत के सौदे का सब्ंजबांग दिखाते हैं।

तनवीर जांफरी