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महंगाई
के गंभीर मुद्दे पर बजाय गंभीरता दिखाने के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
द्वारा बुलाई गई बैठक में जिस तरह से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच
एक-दूसरे के सिर महंगाई का ठीकरा फोत्रडने की होत्रड चली उससे साफ हो गया
है कि किसी को भी कमरतोत्रड महंगाई की मार से पिसती जनता की तकलीफों से
कोई सरोकार नहीं रह गया है और सभी महंगाई के मसले पर आखेट की प्रतिस्पर्धा
करने के प्रति ईमानदारी से पहल करने की इच्छा न तो केंद्र सरकार में
दिखाई पत्रडी और ना ही राज्य सरकारों में इसके होने का संकेत ही मिल सका।
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने भी कोई प्रभावी कदम उठाने का भरोसा दिलाने
की बजाय सिर्फ आशावार्दी झुनझुना बजाकर बहलाने की कोशिश भर की है।
उन्होंने महंगाई बत्रढाने वाले कारकों पर प्रहार करने की बनिस्बत यहकहकर
कि मुद्रास्फीति का बुरा दौर बीत चुका है और जल्द ही हालात में सुधार
आयेगा का राग अलाप कर साफतौर पर जतला दिया है कि महंगाई पर लगाम कसने के
मामले में संप्रग सरकार पूर्णत: असहाय है। मुनाफाखोरों और जमाखोरों पर
सीधी कार्रवाई का ऐलान करने से भी प्रधानमंत्री ने खुद को बचाये रखा और
चेतावनी भर देकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झटकार दिया। जबकि देशवासी
इस बैठक से आशाएं लगाये थे कि सरकार कम से कम अब तो महंगाई से राहत दिलाने
के कदम जरूर उठायेगी किन्तु बैठक से जनता को ना उम्मीदी ही हाथ लगी है।
यह अपने आप में कितनी हास्यपदता रही कि बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने
चीनी और गेहूं की कीमतें आसमान में पहुंचाने वाले कृषि मंत्री शरद पवार
को फटकार लगाने की जगह उनकी पीठ थप थपकार सराहना कर उन्हें ब्लेक गेम
खेलने का अघोषित परमिट ही थमा दिया। खाद्यान्न की कीमतों में तेजी से हो
रही बत्रढोत्तरी से आम आदमी को हो रही परेशानियों के प्रति सरकार ने अपनी
तारीफ से शाब्दिक चिंता जाहिर कर जिस तरह से अपने हाथ खत्रडे कर दिये।
उससे सिध्द हो गया है कि धनबलियों की सरकार पूर्णत: चेरी बन चुकी है।
सरकार ने राज्य सरकारों से खाद्यान्न वस्तुओं का उत्पादन बत्रढाने की
नसीहत तो दे डाली किन्तु उत्पाद बत्रढाने के लिए केंद्र सरकार ऐसे कौन से
करिश्माई उपाय कर रही है जिसमें राज्य सरकारें सहभागिता निभा सके और इसकी
तफसीलवार जानकारी सामने रखने से परहेज कर गई। सरकार का यह दावा करना कि
कीमतें स्थिर है ओर बुरा दौर जा चुका है कोई उपलब्धि का सूचक नहीं माना
जा सकता क्योंकि कीमतें आसमान छूने के बाद अगर स्थिर हैं तोयह स्थिरता बनी
रहना कोई तीर मारने जैसी बात तो है नहीं जिस पर केंद्र सरकार सीना फुलाकर
कुप्पा हो रही है। दालों की कीमतें नीचे उतारने के लिए सार्वजनिक वितरण
प्रणाली के माध्यम से सस्ती दरों पर दालें आम जनता को उपलब्ध कराने और
चीनी की मात्रा बत्रढाकर जनता को देने की कोई व्यवस्था तत्काल सरकार करने
की ओर भी ध्यान नहीं दे रही है। जब सरकार महंगाई का ग्राफ नीचे उतारने के
लिए कुछ कर ही नहीं सकती तो बैठकें आयोजित कर ड्रामेबाजी करने की जहमत
क्यों उठा रही है। |