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सख्त कानून पर राजनीतिक आखेटबाजी से नहीं होगा देश का भला
 

फ्रांस के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते से प्रफुल्लित प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने कुशल राजनीतिज्ञ का परिचय देते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के संदर्भ में अपनी सरकार और आतंकवादी वारदातों को लेकर अपने गृहमंत्री शिवराज पाटिल का यह कहते हुए बचाव किया कि किसी एक व्यक्ति पर दोष मत्रढने से आतंकवाद पर काबू पाना संभव नहीं है। सीमा पर आतंकवाद, घुसपैठ और संघर्ष विराम उल्लंघन को लेकर उम्मीद जताई कि इस्लामाबाद निकट भविष्य में भारत की चिंताओं को दूर करेगा। उनका कहना है कि देश को अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संकट के प्रभावों से बचाना संप्रग सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके बाद आतंकवाद और नक्सलवादी समस्या से निपटना उनकी दूसरी सबसे बत्रडी प्राथमिकता है। इसमें वह कोई कसर नहीं छोत्रडेंगे। आम देशवासी के हित में किये जाने वाले आर्थिक सुधारों की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संकट के प्रभावों से बचा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। य भी कहना है कि सरकार के शेष कार्यकाल इन प्राथमिकताओं को पूरा करने में सरकार पहल कदमी करने के प्रति दृत्रढ इच्छाशक्ति रखती है। श्री सिंह ने गरीबों को लाभान्वित करने के लिए कल्याणकारीं योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को अपनी सरकार की तीसरी प्राथमिकता ठहराया। उन्होंने आशा जताई कि मुद्रास्फीति की दर जल्द ही काबू में कर ली जाएगी। श्री सिंह का यह मानना है कि देश इस समय कठिन हालात से गुजर रहा है कतई गलत नहीं ठहराया जा सकता। उनका कहना है कि आतंकवाद के मुकाबले के लिए हमारी विभिन्न प्रक्रियाओं में सुधार की जरूरत है। आतंकवाद से निपटने के लिए न केवल दृत्रढ इच्छाशक्ति की जरूरत है बल्कि सख्त कानून का होना भी जरूरी है। इस बात को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायण ने भी उठाया है। नारायण शायद यह मानते हैं कि राजनीतिक सख्त कानून नही लागू कर पा रही है लेकिन राज्य सरकारों को सख्त कानून लागू करने की अनुमति तो दी जानी चाहिए। इसीलिए जब गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने यह कहा कि आतंकवाद से लत्रडने के लिए किसी प्रकार के नए और सख्त कानून की जरूरत नहीं है तो शायद उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि उनकी नाक के नीचे ही दिल्ली में इस प्रकार बम धमाके हो सकते है। पाटिल तो ढिंढोरा पीट रहे थे कि कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में हो रहे बम धमाकों की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ज्यादा है। केंद्र सरकार का काम तो मात्र सूचना देना भर है और राज्य सरकारों को जो भी मदद चाहिए दी जाती है। केंद्र राज्य सरकारों की हर संभव मदद भी कर रहा है। पाटिल फरमा रहे थे कि आतंकवाद से निपटने के लिए सख्त कानूनों की कोई जरूरत नहीं है। किन्तु जब आतंकवादी दिल्ली पर चत्रढ दौत्रडे तो कांग्रेस नेताओं के सुर बदल गए। सबको सख्त कानून की याद सताने लगी।अगर अमरीका आतंकवाद से निपटने के सख्त कानून बना सकता है तो भारत को इस तरह के कानून बनाने में हिचकिचाहट क्यों हो रही है।