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हमारे देश की आजादी के 60 सालों का इतिहास साक्षी
है कि स्वतंत्र भारत ने तकरीबन सभी क्षेत्रों में सन्तोषजनक तरक्की
की है किन्तु दिनोंदिन बत्रढ रही आबादी पर काबू न हो पाने से हमारी
अर्थव्यवस्था का गणित लत्रडखत्रडाता नजर आ रहा है। साल दर साल
आस्ट्रेलिया के बराबर जुत्रडती जनसंख्या हमारे विकास को अवरूध्द कर
बेरोजगारी को बत्रढावा दे रही है। तदनुसार जनसंख्या की तीव्र गति
को नियंत्रित किए बिना हमें भारत भूमि से गरीबी व भूखमरी के खात्मे
की उम्मीद छोत्रड देनी चाहिए। दिनों दिन बत्रढ रही बेरोजगारी,
निरक्षरता, बाल मजदूरी, शिशु मुत्यु दर, कुपोषण से उपजी अनेकोंनेक
बीमारियां, झुग्गियों की संख्या में वृध्दि की देन हैं। अत: समय का
तकाजा है कि हमारी सरकारी को पोलियों उन्मूलन की तर्ज पर बत्रढती
आबादी पर काबू पाने हेतु जोरदार अभियान चलाना चाहिए। अन्यथा व दिन
दूर नहीं जब भारतवर्ष (जो कभी सोने की चित्रिडया कहा जाता था) नंगे,
भुखे तथा चोर-डकैतों का देश बनकर रह जाएगा। अगर यह सही हैं कि देश
की खुशहाली हेतु सरकार ने कई आर्थिक सुधार प्रारंभ किए हैं किन्तु
स्पष्ट नीति के अभाव में ये कार्यक्रम ज्यादा उपयोगी साबित नहीं हो
पा रहे हैं। इस विषय में हमें चीन जैसे विशाल आबादी वाले देश से
सबक हासिल करना चाहिए जिसने खुलेपन व आर्थिक उदारीकरण लागू करते
समय अपने हितों को प्रमुख स्थान दिया। नतीजतन आज दुनियाभर के बाजारों
में चीनी उत्पादों की धूम मची हुई है। विश्व में सबसे बत्रडी आबादी
वाला देश होने के बावजूद चीन न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है
अपितु उसकी बत्रढती ताकत के कारण अमरीका जैसा शक्तिशाली देश भी उससे
खौफजदा है। इसके विपरीत हमारे देश ने जिस प्रकार का उदारीकरण अपनाया।
उससे लाभ की बजाय हानि अधिक उठानी पत्रड रही है। यह बात अब जगजाहिर
है चुकी है कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत के बुनियादी
ढांचे को कमजोर बनाकर बेरोजगारी को बत्रढावा दिया। अपनी कुटिल नीति
की मार्फत विदेशी कंपनियों ने देश की लघु इकाइयों को ठप्प करके देश
में बेरोजगारों की फौज खत्रडी कर दी। |