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सर्वसाक्षरता में अग्रणी माने जाने वाले केरल के
कन्नूर में पिछले कुछ दिनों से हिंसा की जो आग सुलग रही है उसकी
तपिश देश भर में महसूस की जाने लगी है। वैसे इस राज्य में
मार्क्सवादियों और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच हिंसा का लंबा
इतिहास रहा है इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। पिछले तीस सालों में
माकपा और संघ समर्थकों के बीच हिंसक झत्रडपों के कारण अब तक करीब
275 से ज्यादा लोग असमय ही काल का ग्रास बन चुके है। हिंसा की इस
तांडव लीला को लेकर पिछले दिनों संसद में भी खासा शोरगुल सुनाई दिया।
आरोप-प्रत्यारोप का आखेट कुछ इस तरह खेला जा रहा है मानो कन्नूर वन
डे क्रिकेट की कोई पिच हो। पुलिस रिकार्ड पर अगर नजर डाली जाए तो
यह साफ हो जाता है कि सर्वाधिक दंगे-फसाद करने में कन्नूर जिला
अव्वल रहा है। वर्ष 2006 में दंगों के दौरान यहां 74 लोग हिंसा का
शिकार बने। वर्ष 1970 और 1981 का इतिहास अगर उठाकर देखा जाए तो वह
भी रक्त से भरा हुआ ही नजर आयेगा। इस हिंसाचार को देखते हुए अगर
केरल उच्च न्यायालय ने कठोर टिप्पणियां की हैं तो इसमें बुरा क्या
है लेकिन राजनीतिक दुकाने चलाने वाले नेताओं को इससे काफी बुरा लगा
है तभी तो उन्होंने केरल उच्च न्यायालय की टिप्पणियों को संविधान
की सीमा से अलग निरूपित कर दिया है। जहां तक राजनीतिक सहिष्णुता का
प्रश्न है तो वह तो कभी की कपूर के समान यहां से काफूर हो चुकी है।
अब तो हर तरफ घृणित और बदसूरत राजनीति का ही वर्चस्व कायम होकर रह
गया है। केरल में हिंसा को समाप्त करने के लिए राजनीतिक दलों को
दलगतस्वार्थ से ऊपर उठकर काम करना होगा। सभी दलों के मौजूदा
नेतृत्व को अंधेरे से लत्रडने के प्रति खुलकर सामने आने को दृत्रढ
संकल्पित होना चाहिए। हिंसा को पनपने देना सभी के लिए
दुर्भाग्यपूर्ण ही नही भविष्य को देखते हुए भी कम खतरनाक नहीं समझना
चाहिए। |