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फल व सब्जियों पर मुनाफाखोरों का साम्राज्य
 

 फल व सब्जियों में महंगाई के लिए कम उपज को कोसना बंद कीजिये। पिछले छह महीने के दौरान फल व सब्जियों का उत्पादन भी बढ़ा है और मंडियों में आवक भी। लेकिन प्याज, टमाटर व आलू से लेकर हरी सब्जियां और सेब से लेकर पपीता तक की कीमतें आम उपभोक्ता के हाथ जला रही हैं। फल व सब्जियों का बाजार मुनाफाखोरों के हाथ में है और सरकार पूरी तरह असहाय है। राष्ट्रीय हार्टीकल्चर बोर्ड के 973 बाजारों के ताजा आंकड़े केंद्र व राज्य सरकारों को आईना दिखा रहे हैं। इन बाजारों में फल व सब्जियों की रोजाना की आवक और उनकी दैनिक कीमतें दर्ज की जाती हैं। फल और सब्जी बाजार की ताजा स्थिति ने मांग व आपूर्ति के सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया है। आपूर्ति घटे या बढ़े, कीमतें सदा बढ़ती ही रहती हैं। कई सब्जियों व फलों की फसल के दौरान महीने 25 से 30 फीसदी तक आपूर्ति बढ़ी लेकिन कीमतें घटने के बजाय उछल गई।
सब्जियों में सबसे अहम आलू के खुदरा मूल्य 26 से 30 रुपये प्रति किलो की ऊंचाइयां छू रहे हैं। मार्च 2009 में देश के सब्जी बाजारों में आलू की कुल आवक 10.78 लाख टन हुई थी। तब थोक बाजार में आलू 480 रुपये क्विंटल बिका। लेकिन जुलाई में आलू की आवक 11.45 लाख टन तक पहुंच गई, जिससे मूल्य घटना चाहिए था। पर हुआ इसके उलट, आलू का मूल्य दोगुने से भी अधिक यानी 1016 रुपये प्रति क्विंटल हो गया।
चर्चित सब्जियों में शुमार प्याज के हाल भी कुछ अच्छे नहीं रहे। जुलाई के मुकाबले अगस्त में प्याज की आवक में 20 हजार टन की वृद्धि हुई, लेकिन मूल्य घटने के बजाए बढ़ गये। हद तो अक्टूबर महीने में हुई, जब सामान्य आवक के बावजूद कीमतें 50 फीसदी से भी अधिक बढ़ गई। इस माह के दौरान प्याज की कीर्मत 881 रुपये क्िवटल से बढ़कर 1469 रुपये प्रति क्िवटल हो गई। लेकिन यह भाव थोक बाजार का है, खुदरा बाजार तो वैसे भी बेकाबू रहता है जहां आलू व प्याज के मूल्य 26 से 30 रुपये प्रति किलो हैं। सबसे सस्ता रहने वाला सीताफल या कद्दू भी अच्छी आपूर्ति के बावजूद खुदरा बाजार में 20 रुपये किलो तक पहुंच गया।
महंगाई के चलते फलों के रंग और भी सुर्ख हुए हैं। सेब के मूल्य जनवरी से लेकर अक्टूबर तक बढ़े ही हैं, जबकि मंडियों में इनकी आवक में पर्याप्त सुधार हुआ है। सितंबर व अक्टूबर के बीच मंडियों में सेब की आवक समान रही है, लेकिन मूल्य में 15 फीसदी की वृद्धि हुई है। अप्रैल व मई में नीबू की फसल बाजार में पहुंचती है। आपूर्ति के 40 फीसदी बढ़ने के बावजूद मूल्य घटे नहीं, बल्कि 25 फीसदी बढ़ गये। आमतौर पर सस्ता रहने वाला पपीता भी इन महीनों में रंग दिखा गया। बाजार में आपूर्ति बढ़ने के साथ कीमतें भी बढ़ गई।