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भारत में
अनेकों राष्टं्रीय, क्षेत्रीय तथा राज्य स्तरीय राजनैतिक दलों को देश की
राजनीति में सक्रिय देखा जा सकता है। इनमें लगभग सभी राजनैतिक दलों के
अलग-अलग राजनैतिक एजेण्डे, अलग पहचान, अलग चुनाव घोषणा पत्र, अलग झण्डे,
अलग विचाराधारा आदि हुआ करती है। लगभग सभी राजनैतिक दलों द्वारा अपने-अपने
संगठनों की महिमा का बखान बढ़ा-चढ़ा कर किया जाता है। लगभग प्रत्येक
राजनैतिक दल मतदाताओं को यह समझाने में लगे रहते हैं कि देश व समाज के
लिए सबसे अधिक हितकारी एवं सबसे अधिक गंभीर दल यदि कोई है तो वह मात्र
उन्हीं का संगठन है। प्रत्येक संगठन अपने नेताओं की क़ुर्बानियों तथा उनकी
कारगुज़ारियों को भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता है। और विश्व के सबसे बड़े
लोकतंत्र भारतवर्ष में सपन्न होने वाले चुनावों में वही राजनैतिक दल बाज़ी
मार ले जाते हैं जो जनता को यह समझा पाने में सफल हो जाते हैं कि उन्हीं
का दल सच्चा, जनहितैषी है तथा अन्य राजनैतिक दलों से हर हाल में बेहतर
है।
भारतीय जनता पार्टी भी देश के ऐसे ही एक प्रमुख राजनैतिक दलों में एक है,
जोकि न सिर्फ़ अपने को देश की सबसे बेहतरीन पार्टी बताती रही है बल्कि
भाजपा नेताओं ने दो दशकों से भारतीय जनमानस को यह समझाने का भरपूर प्रयास
किया है कि भाजपा एक ऐसा राजनैतिक संगठन है जोकि अन्य राजनैतिक संगठनों
से बिल्कुल भिन्न है अर्थात् भाजपा इज़ 'ए पार्टी विद डिफ़रेंस'। अपनी इस
कथित भिन्नता के दावे को सही ठहराने हेतु पार्टी नेताओं द्वारा जो दलीलें
पेश की जाती रही हैं उनमें पार्टी को राष्टं्रभक्ति में सराबोर एकमात्र
पार्टी बताना, अपने संगठन से जुड़े सभी नेताओं को अत्यन्त अनुशासित,
समर्पित व ईमानदार बताना, त्यागी व तपस्वी नेताओं से भरपूर एक राजनैतिक
दल बताना तथा हिन्दुत्व के लिए समर्पित एकमात्र संगठन जैसी अनेकों बातें
शामिल हैं। ख्0 वर्षों से भाजपा नेता इन्हीं विशेषताओं को गिना-गिना कर
अपनी पीठ स्वयं थपथपाते आ रहे हैं। या भाजपा के पार्टी विद डिफ़रेंस के
उपरोक्त सभी दोवे सही हैं? आई लेते हैं इसका एक जायज़ा।
भ्रष्टंाचार निश्चित रूप से इस समय राजनैतिक दलों के लिए एक साधारण सा
घटनाक्रम बनकर रह गया है। आए दिन किसी न किसी पार्टी का कोई न कोई नेता
ा्रष्टंाचार के आरोपों से घिरा दिखाई दे जाता है। नेताओं की भ्रष्टंाचार
में संलिप्तता इस हद तक आगे बढ़ रही है कि अब तो आम व्यक्ति नेताओं को देश
को बेचकर खाने वाले व्यक्ति के रूप में ही देखने लगे हैं। राजनीति में
पदार्पण के बाद एक साधारण व्यक्ति का चंद दिनों में ही मालामाल हो जाना
आम लोगों की इस सोच को मज़बूती प्रदान करता है। अत: यदि अन्य राजनैतिक दलों
के साथ-साथ भाजपा का भी कोई नेता रिश्वत लेते देखा जाए तो इसे कोई अनहोनी
घटना अथवा आश्चर्यचकित कर देने वाली घटना नहीं कहा जा सकता। परन्तु यदि
कोई केंद्रीय मंत्री रिश्वत के पैसों को अपने हाथों में लेते और उस
रिश्वतख़ोरी को जायज़ ठहराते हुए कैमरे के सामने यह कहे कि 'पैसा ख़ुदा तो
नहीं लेकिन ख़ुदा से कम भी नहीं' तो आप इसे कैसी राजनैतिक सोच रखने वाला
नेता कहेंगे। इतनी दिलेरी और सीनाज़ोरी किसी आम राजनैतिक संगठन का व्यक्ति
तो शायद न कर सके परन्तु उस पार्टी का तो नेता कर ही सकता है जो पार्टी 'पार्टी
विद ए डिफ़रेंस' होने का दम भर रही है। आपको याद आ गया होगा कि ऐसा साहस
दिखाने वाले नेता का नाम था पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव
जिन्हें कि पार्टी द्वारा निष्कासित भी कर दिया गया था।
अब देखते हैं 'पार्टी विद ए डिफ़रेंस' की दूसरी कारगुज़ारी। बक़ौल दिलीप
सिंह जूदेव साहब के पैसा ख़ुदा से कम नहीं फिर आख़िर पैसे से नफ़रत कौन करेगा।
ख़ुदा से रिश्ता तो हर एक व्यक्ति बेहतर ही बनाकर रखना चाहता है अत: ख़ुदा
रूपी पैसा लेने से नेता भी योंकर इन्कार करे। परन्तु पैसे और ख़ुदा की
बराबरी का दावा करने के बावजूद आप इस देश के किसी भी राजनैतिक दल के
राष्टं्रीय अध्यक्ष को रिश्वतख़ोरी में आरोपित शायद नहीं पाएंगे। और यदि
आरोप होंगे भी तो वे प्रमाणित नहीं होंगे अथवा अदालतों में विचाराधीन
होंगे। परन्तु 'पार्टी विद ए डिफ़रेंस' का दावा करने वाली भाजपा के
राष्टं्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को सारा देश व सारी दुनिया रिश्वत के
पैसों को अपने हाथों में लेते देख चुका है। जब से इस राष्टं्रीय अध्यक्ष
ने अपना 'फ़ेस विद डिफ़रेंस' देशवासियों को नोट गिनते हुए दिखाया तब से
पार्टी विद ए डिफ़रेंस का यह मुखिया राजनैतिक पटल से बिल्कुल ही ग़ायब हो
गया। पार्टी ने इस राष्टं्रीय अध्यक्ष को न सिर्फ़ अपने पद से हटा दिया
बल्कि बदनामी के भयवश फ़िलहाल उसे सक्रिय राजनीति से ाी दूर रखा हुआ है।
दिसबर ख्00भ् में भारतीय सांसदों को निशाना बनाते हुए मीडिया द्वारा किया
गया 'ऑप्रेशन दुर्योधन' भी अभी देशवासी भूले नहीं होंगे। कोबरा पोस्ट तथा
आज तक द्वारा सांसदों को लोकसभा में प्रश्र पूछे जाने हेतु रिश्वत की
पेशकश की गई थी। क्भ्000 रुपए से लेकर एक लाख दस हज़ार रुपए तक की रिश्वत
स्वीकार करने वालों में क्क् सांसदों के चेहरे गुप्त टी वी कैमरे के
समक्ष बेनक़ाब हुए थे। इनमें स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहने का दम
भरने वाली कांग्रेस पार्टी का एक सांसद, राष्टं्रीय जनता दल का एक सांसद
तथा बहुजन समाज पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन सांसद शामिल थे।
जबकि 'पार्टी विद ए डिफ़रेंस' अर्थात् भाजपा के अकेले म् सांसद इस कांड
में शामिल थे। भाजपा के ही एक राज्यसभा सदस्य को भी ऑप्रेशन दुर्योधन में
अन्य लालची सांसदों की ही तरह रिश्वत लेते देखा गया था। पार्टी विद ए
डिफ़रेंस के इन माननीय सांसदों के नाम भी आपको एक बार पुन: याद कराए देते
हैं जोकि लोकतंत्र का मंदिर समझे जाने वाली भारतीय संसद के लिए एक कलंक
साबित हुए थे। यह भाजपा सांसद थे। छत्रपाल सिंह लोढ़ा (राज्यसभा सदस्य)
चन्द्र प्रताप सिंह, वाई जी महाजन, राजन रामपाल, अन्ना साहब एम के पाटिल,
प्रदीप गांधी तथा सुरेश चंदेल (सभी सदस्य लोकसभा)। भारतीय संसद के इतिहास
में उपरोक्त माननीय सांसदों ने ही पैसे लेकर सदन में प्रश्र पूछे जाने का
दुस्साहस किया था।
गत् ख्ख्जुलाई को भी लोकसभा में विश्वासमत से कुछ ही समय पूर्व वह घटना
घटी जिसने भारतीय संसद के स्वाभिमान को झकझोर कर रख दिया। संसद पर हुए
आतंकवादी हमले के बाद संसद भवन की सुरक्षा इतनी सत कर दी गई है कि संसद
भवन में अवांछनीय वस्तुएं ले जाना तो दूर की बात है वहां परिंदा भी पर नहीं
मार सकता। परन्तु भाजपा के तीन सांसदों द्वारा बड़े ही आश्चर्यजनक व
रहस्यमयी ढंग से एक थैले में से नोटों के बड़े-बड़े बंडल निकालकर दिखाए जाने
लगे। इन भाजपा सांसदों का आरोप था कि यह रुपए जिनकी क़ीमत क् करोड़ बताई जा
रही थी उन्हें रिश्वत के तौर पर विश्वासमत के दौरान मतदान न करने हेतु
दिए गए थे। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इस मामले की जांच हेतु एक सात
सदस्यीय सर्व दलीय समिति का गठन कर दिया गया है जोकि इस बात की जांच करेगी
कि यह पैसे कहां से आए और सांसदों को यों और किसने दिए या फिर यह सब एक
बड़ा षडयन्त्र मात्र था। इस प्रकरण में यथाशीघ्र दूध का दूध और पानी का
पानी अवश्य हो जाएगा। परन्तु भाजपा सांसदों द्वारा जिस प्रकार इस अति
सुरक्षित संसद भवन के भीतर नोटों के बंडलों से भरे हुए बैग बिना किसी
जांच, बिना किसी बाधा व रोक टोक के पहुंचा दिए गए, इस घटना ने भी सुरक्षा
एजेन्सियों सहित पूरे देश को हैरानी में डाल दिया है। अब यह प्रश्र खड़ा
हो गया है कि पार्टी 'पार्टी विद ए डिफ़रेंस' अर्थात् भाजपा के सांसद जब
संसद की सुरक्षा चौकसी का मज़ाक़ उड़ाते हुए संसद के भीतर नोटों से भरे बैग
ले जा सकते हैं तो फिर पैसे लेकर काम करने के आदी होते जा रहे यही सांसद
आख़िर संसद के भीतर या कुछ नहीं पहुंचा सकते।
बहरहाल 'पार्टी विद ए डिफ़रेंस' अपनी डिफ़रेंस (भिन्नता) रखने वाली अनेकों
ऐसी कारगुज़ारियों में अब भी आगे-आगे चल रही है। जैसे कि कांग्रेस ने अपने
ब्0 वर्षों के शासनकाल में तो कभी भी इंडिया शाईनिंग व फ़ील गुड जैसा नारा
नहीं लगाया परन्तु इन तथाकथित राष्टं्रवादियों के शासनकाल में भारतीय जनता
को फ़ील गुड भी होने लगा और इंडिया भी शाईनिंग करने लगा था। और अब फिर
भाजपा ने लोकसभा चुनावों से पूर्व ही अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा
कर अन्य राजनैतिक दलों से डिफ़रेंस रखने का काम किया है। 'प्राईम मिनिस्टर
इन वेटिंग' जैसी बात ाी देश में पहली बार सुनाई दे रही है। इसके
अतिरिक्त संसद पर हुए हमले व कंधार विमान अपहरण कांड में ख़ूंखार
आतंकवादियों को जेल से रिहा कर तथा भारतीय रक्षा मंत्री के साथ विमान में
बाईज्ज़त कंधार भेजने की घटना को भी भाजपा विरोधी 'पार्टी विद ए डिफ़रेंस'
अर्थात् भाजपा की अहम कारगुज़ारी के रूप में ही देखते हैं। 'पार्टी विद ए
डिफ़रेंस' की भविष्य की कारगुज़ारियों में अब आगे-आगे देखिए होता है या?
निर्मल रानी |