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उत्तर प्रदेश में सत्ता संघर्ष का शंखनाद
 

जनसंख्या तथा लोकसभा सीटों व मतदाताओं की संख्या के ऐतबार से देश के सबसे बत्रडे राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों पूरे उबाल पर है। पिछले लोकसभा चुनावों से पूर्व राज्य में चौथे नंबर पर रहने वाली कांग्रेस पार्टी ने चुनावों में जब से अपनी दयनीय स्थिति में सुधार करते हुए राज्य में दूसरे नंबर का दल होने की हैसियत बनाई है, तब से प्रदेश की सत्तारूत्रढ बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख तथा राज्य की मुख्यमंत्री मायावती को समाजवादी पार्टी तथा भारतीय जनता पार्टी के बजाए कांग्रेस पार्टी ही उनके अपने लिए सबसे बत्रडा ख़तरा नज़र आने लगी है। दूसरी ओर राज्य में अपनी तेज़ी से सुधरती हालत को देखकर राज्य के कांग्रेस नेताओं में अचानक नया जोश व उत्साह पैदा हो गया है। उत्तर प्रदेश के कांग्रेसजनों में लगभग दो दशकों बाद आई इस नई ऊर्जा व स्फूर्ति ने तथा राज्य की राजनैतिक परिस्थितियों का मुक़ाबला करने की लगभग सभी राजनैतिक दलों की वर्तमान ज़रूरत के परिणामस्वरूप राज्य में वाक्युध्द यहां तक कि असंसदीय व अमर्यादित बयानबाज़ी का दुर्भाग्यपूर्ण दौर भी शुरु हो गया है।
गत् 15 जुलाई को उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष डॉ रीता बहुगुणा जोशी को उनकी एक अभद्र बयानबाज़ी के सिलसिले में ग़ाज़ियाबाद से उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। बाद में उन्हें मुरादाबाद ले जाया गया जहां से रीता जोशी को 14 दिन के लिए जेल भेज दिया गया है। रीता जोशी पर आरोप है कि उन्होंने प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का नाम लेकर एक जनसभा में ऐसे अपशब्द कहे जो पूरी तरह से असभ्य व ग़ैरक़ानूनी थे। मायावती की सरकार ने आनन-फानन में इस भाषणबाज़ी पर संज्ञान लेते हुए उनके विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई कर डाली। इसके पश्चात मायावती ने लखनऊ में एक पत्रकार वार्ता को संबोधित किया। इस पूरी प्रेस कान्फ्रेंत्रस के दौरान मायावती ने उनपर की गई अभद्र टिप्पणी की कथित आरोपी रीता बहुगुणा जोशी का नाम तो केवल एक बार ही लिया। बार-बार उन्हें केवल महिला कहकर संबोधित करती रहीं जबकि सोनिया गांधी का नाम बार-बार लेकर मायावती ने इस घटनाक्रम को माया बनाम सोनिया बनाने की कोशिश की। ज़ाहिर है इसका मक़सद सोनिया गांधी को चुनौती देना कम जबकि मायावती के अपने राजनैतिक क़द को ऊंचा करने का प्रयास अधिक था।
बहरहाल राजनीति में इस प्रकार के ओछे हथकंडे प्राय: इस्तेमाल होते ही रहते हैं। परन्तु उत्तर प्रदेश में सत्ता संघर्ष को लेकर लगभग सभी राजनैतिक दलों द्वारा जो हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, वे आने वाले समय के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। निश्चित रूप से रीत बहुगुणा द्वारा एक जनसभा में दिए गए उनके भाषण का आपत्तिजनक अंश जोकि टीवी पर बार-बार दिखाया गया, वह क़तई तौर पर मुनासिब नहीं था। ठीक उसी तरह जैसे कि पीलीभीत में वरुण गांधी की टिप्पणी अशोभनीय, अमर्यादित तथा समाज में वर्ग संघर्ष को न्यौता देने वाली टिप्पणी अमर्यादित थी। परन्तु ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटिया बयानबाज़ी केवल रीता जोशी या वरुण गांधी के द्वारा ही उत्तर प्रदेश में पहली बार की गई हो। मायावती के अपने भाषणों का रिकॉर्ड भी अशोभनीय व अभद्र टिप्पणियों के लिहाज़ से क़तई अच्छा नहीं है। मायावती का तो राजनैतिक अस्तित्व ही इस प्रकार की बेहूदा, घटिया, तनाव फैलाने वाली जाति आधारित भेदभाव को हवा देने वाली टिप्पणियों पर क़ायम है।
चाहे देवी देवताओं से अपनी तुलना करने का मामला हो, ठाकुर, राजपूत, वैश्य समाज तथा ब्राह्मण समाज के प्रति अभद्र शब्द प्रयोग करने की बात हो अथवा इनके विरुध्द अशोभनीय नारे लगाए जाने हों, रिश्वत रूपी धन को जायज़ ठहराए जाने का मामला हो, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अथवा पंडित नेहरु जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति अशोभनीय टिप्पणी की बात हो, मायावती कहीं भी पीछे नहीं दिखाई देतीं। रीता बहुगुणा ने भी मायावती के विरुध्द टिप्पणी कर उस टिप्पणी की त्वरित कार्रवाई के रूप में अपनी लखनऊ स्थित कोठी को धू-धू कर जलते हुए देख लिया। इतने में ही न केवल कांग्रेस बल्कि मायावती के सभी विरोधियों को समझ लेना चाहिए कि मायावती के विरुद्ध की गई टिप्पणियों का परिणाम क्या कुछ हो सकता है।
दरअसल रीता जोशी के बयान से अधिक उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुत्रडी अमेठी संसदीय क्षेत्र की एक घटना इन दिनों चर्चा का विषय बननी थी। परन्तु रीता जोशी के भाषण ने उस अमेठी हादसे को ख़बरों में उभरने ही नहीं दिया। अमेठी व रायबरेली संसदीय क्षेत्र के बारे में लगभग पूरा देश व सभी राजनैतिक दल यह भली-भांति जानते हैं कि इन दोनों ही लोकसभा सीटों पर कांग्रेस पार्टी का लगभग एकाधिकार है। प्रदेश की ग़ैर कांग्रेसी सरकारों को यह बात फूटी आंख नहीं भाती। अत: इन क्षेत्रों के लोगों को अपने क्षेत्र के विकास को लेकर आने वाली अत्रडचनों के रूप में नेहरु-गांधी परिवार के प्रति अपनी वफ़ादारी का भुगतान करना पत्रडता है। ख़बर है कि इसी सौतेलेपन की शिकार अमेठी की जनता इन दिनों 14 घंटे से लेकर 16 घंटे तक की बिजली कटौती का सामना कर रही है। गत् दिनों गर्मी से झुलसते तथा बिजली की भीषण कटौती से त्राहि-त्राहि करते अमेठी के लोगों ने राज्य सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किया। इस विरोध प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश की पुलिस ने उनपर जमकर लाठियां बरसाईं तथा प्रदर्शनकारियों को घरों में घुसकर बत्रडी बेरहमी से पीटा व अपमानित किया। इस पुलिसिया क़हर का शिकार कई दलित परिवार के सदस्य तथा महिलाएं भी हुईं। ज़ाहिर है इन सबके बाद अमेठी से सांसद तथा विशेषकर उत्तर प्रदेश की कांग्रेस पार्टी की राजनीति की कमान को अपने हाथों में संभाल चुके राहुल गांधी को अपने क्षेत्र में प्रभावित तथा भुक्तभोगी मतदाताओं का हाल जानने व पूछने के लिए अमेठी जाना ही था और वे अमेठी गए भी।
निश्चित रूप से उपरोक्त सभी हालात इस बात की ओर साफ़ इशारा कर रहे हैं कि यह सब कुछ सत्ता बचाने व सत्ता दबोचने अर्थात् सत्ता संघर्ष से ही जुत्रडे हुए घटनाक्रम हैं। ज़ाहिर है दुनिया के भारत जैसे सबसे बत्रडे लोकतंत्र में प्रत्येक राजनैतिक दल को लोकतांत्रिक तरीक़े से अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है। परन्तु अभिव्यक्ति की इस बेलगाम स्वतंत्रता ने तथा किसी वर्तमान सत्ताधीश द्वारा किए जाने वाले सत्ताशक्ति के निरंतर दुरुपयोग ने आम मतदाताओं को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि वास्तव में नेताओं द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली बेहूदा एवं घटिया शब्दावलियां, भाषणों में प्रयोग किए जाने वाले उनके कत्रडवे व तीखे शब्द समाज को विभाजित करने जैसी उनकी बातें, समाज व देश के हित में हैं अथवा यह सब समाज विभाजक नेताओं के सत्ता हासिल करने या सत्ता बरक़रार रखने की उनकी नापाक कोशिशों का परिणाम मात्र हैं?
बहरहाल जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में चुनाव क़रीब आते जाएेंगे, ऐसा लगता है कि अभी और भी बहुत कुछ इसी प्रदेश में सत्ता संघर्ष को लेकर देखना पत्रडा सकता है। कांग्रेस पार्टी यदि दो दशकों बाद पुन: सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए गांधीगीरी का सहारा ले रही है तो भारतीय जनता पार्टी भी वरुण गांधी जैसे ही तीखे तेवर रखने वाले नेता को आगे रखकर लोहे को लोहे से काटने की रणनीति पर काम कर रही है। उधर मुलायम सिंह यादव कल्याण सिंह की मित्रता से 'आहत' हुए हैं तो आज़म ख़ां की नई दुश्मनी उनके लिए सिरदर्द बनी हुई है। ऐसे में अमर सिंह जैसे उनके सिपहसालार कौन सी नई चाण्क्य नीति लेकर अगले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के बीच जाएंगे यह भी देखना होगा। परन्तु इन सबके अतिरिक्त पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश की सत्ता को संभालने वाली बहुजन समाज पार्टी ताज़ातरीन संसदीय चुनावों में अपने मुंह की खाने के बाद तथा पार्टी प्रमुख मायावती के देश के प्रधानमंत्री बनने के सपने धराशायी होने के बाद, कौन सी रणनीति या नई सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग करेगी, यह भी यथाशीघ्र सामने आ जाएगा। कुल मिलाकर इन राजनैतिक हालात से यह स्पष्ट हो गया है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता संघर्ष का शंखनाद हो चुका है।

निर्मल रानी,