|
देश
के अठ्ठारहवें प्रधानमंत्री के रूप में डॉ मनमोहन सिंह के शपथ लेने
के बाद कांग्रेस के इस दावे की पूर्णतय: पुष्टि हो गई है कि वाक़ई 'सिंह
इज़ किंग'। परन्तु इन ताज़ातरीन चुनावों के प्रचार अभियान के दौरान
विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा इसी कांग्रेस पार्टी के संबंध में
कांग्रेस के विरोधी दलों द्वारा कुछ ऐसी बातें की गईं जिन्हें जनता
आसानी से भुला नहीं सकती। कांग्रेस पार्टी तथा ख़ासतौर पर नेहरु
गांधी परिवार के सदस्यों पर निशाना साधते हुए उन्हें अपमानित करने
तथा कांग्रेस पार्टी के प्रति कत्रडवे शब्दों काप्रयोग करने में
कोई कसर नहीं छोत्रडी गई। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस पार्टी की
तुलना 'कांग्रेस घास' से करते हुए जनता को यह बताने की कोशिश की गई
कि कांग्रेस पार्टी 'कांग्रेस घास' की ही तरह नुक़सानदेह है। अत: इसे
उसी प्रकार साफ़ कर देना चाहिए जैसे कि 'कांग्रेस घास' साफ़ की जाती
है। चुनाव प्रचार के दौरान कई नेता यह कहते सुने गए कि इन चुनावों
में कांग्रेस का 'सूपत्रडा साफ़' होना तय है। कई नेता बत्रडे ही
आत्मविश्वास के साथ कह रहे थे कि इस बार कांग्रेस तीन अंकों की
गिनती तक भी नहीं पहुंच सकेगी। यहां तक कि संयुक्त प्रगतिशील
गठबंधन सरकार में कांग्रेस के सहयोगी रहे कुछ नेता कांग्रेस पार्टी
के इस फ़ैसले का मज़ाक़ उत्रडा रहे थे जिसके अन्तर्गत पार्टी ने उत्तर
प्रदेश और बिहार में अधिकांश सीटों पर अपने उम्मीदवार खत्रडे करने
की घोषणा की थी।
बहरहाल चुनाव परिणाम आ गए हैं। निश्चित रूप से यह परिणाम
अप्रत्याशित हैं तथा कांग्रेस ने पार्टी नेताओं की उम्मीदों से भी
कहीं अधिक बत्रडी जीत हासिल की है। इस जनादेश के द्वारा एक बार फिर
यह साफ़ हो गया है कि नेतागण अपनी राजनैतिक प्रतिद्वन्द्विता के चलते
किसी भी पार्टी को चाहे जितना अपशब्द कहें अथव नीचा दिखाने की
कोशिश करें परन्तु वास्तव में अन्तिम निर्णय मतदाताओं का ही होता
है। किसे 'कांग्रेस घास' की तरह ख़तरनाक समझना है अथवा किसका 'सूपत्रडा
साफ़' करना है, यह नेता नहीं बल्कि मतदाता निर्धारित करते हैं। और
यही इस चुनाव में देखने को भी मिला। अहंकारपूर्ण इन शब्दों के तीर
सबसे अधिक पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा बिहार आदि राज्यों में
छोत्रडे गए। यहां के चुनाव परिणाम दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं, न
ही किसी दल विशेष का उख्रेख करने की कोई ख़ास ज़रूरत है। आम जनता व
मतदाता एवं सुधि पाठक सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
के विषय में उनकी चाल, उनके स्वास्थ आदि को लेकर, कांग्रेस अध्यक्ष
सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह के राजनैतिक रिश्तों को लेकर तथा सोनिया
गांधी के विदेश मूल के विषय में न जाने क्या-क्या बातें कही गईं।
परन्तु यह पब्लिक है सब जानती है। और इसी पब्लिक ने अपनी शक्ति का
प्रयोग करते हुए यह बता दिया कि देश के मतदाता अहंकारपूर्ण,
मसख़रेपन तथा अप्रासंगिक आरोपों प्रत्यारोपों तथा लांछनों के झांसे
में नहीं आने वाले। भारतीय मतदाताओं ने यह भी साबित कर दिया कि किसी
के बहकावे में आने के बजाए वे अपना निर्णय स्वयं लेने में पूरी तरह
सक्षम हैं।हरियाणा में एक क्षेत्रीय दल कांग्रेस का सूपत्रडा साफ़
करने का प्रचार करने पर तुला था। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप
लगाने वाला हरियाणा का यह क्षेत्रीय दल राज्य के अगले वर्ष होने
वाले विधानसभा चुनावों पर नज़रें गत्रडाए हुए था। जम्मु-कश्मीर तथा
पंजाब की भांति यहां भी अगली पीत्रढी को सत्ता हस्तांतरित किए जाने
की तैयारियां दबे पांव चल रही थीं कि अचानक जनादेश 2009 ने भविष्य
के सारे सपने धराशायी कर दिए। कांग्रेस का सूपत्रडा साफ़ करने की
तमन्ना दिल में रखने वाले नेता 'न सनम ही मिला न विसाले सनम' के
पर्याय बनकर रह गए। कुछ ऐसी ही सूरत उत्तर प्रदेश व बिहार राज्य
में भी पैदा हुई। कहां तो उत्तर प्रदेश की सत्तारूत्रढ पार्टी 40
से 50 सांसद जीतकर प्रधानमंत्री पद पर अपना दावा पेश करने की योजना
बना रही थी तो कहां उसी पार्टी को बिना मांगे कांग्रेस को अपना
समर्थन देना पत्रड रहा है।उत्तर प्रदेश का ही एक और क्षेत्रीय दल
चौथा मोर्चा बनाकर कांग्रेस पर दबाव डालने की फ़िराक़ में था। गत् दो
दशकों तक उत्तर प्रदेश में शक्तिशाली रह चुका यह राजनैतिक दल इस
बार भी अपने को धर्म निरपेक्ष मतों का सबसे बत्रडा दावेदार मान रहा
था। परन्तु यह सारी गणित कोरी कल्पना मात्र बनी रह गई। उत्तर
प्रदेश के मतदाताओं ने इस क्षेत्रीय संगठन को भी प्रदेश के
सत्तारूत्रढ दल की तरह ही उसकी उम्मीदों से कहीं कम सीटों पर विजय
दिलाई। उत्तर प्रदेश के इसी क्षेत्रीय संगठन के मुखिया व प्रमुख
रणनीतिकार भी कांग्रेस पार्टी के महत्व को हल्के ढंग से ले रहे थे।
वे मतदाताओं की नब्ज़ को टटोल पाने में पूरी तरह से नाकाम थे। चुनाव
परिणामों ने इस दल को भी यह एहसास करा दिया कि यह कोई ज़रूरी नहीं
कि किसी पार्टी के विषय में कुछ नेताओं अथवा प्रतिद्वन्द्वी
राजनैतिक दलों का जो आंकलन हो वही आंकलन देश के मतदाताओं का भी हो।कुछ
ऐसी ही इबारत जनादेश 2009 के माध्यम से बिहार के मतदाताओं ने भी
लिखी। सम्प्रदाय व जातिवाद के नाम पर मतदान करती आ रही बिहार की
जनता इस बार इन व्यसनों से दूर दिखाई दी। चौथे मोर्चे की बुनियाद
डालने वाले दो प्रमुख नेता जो चुनाव परिणामों के आने के बाद
कांग्रेस पार्टी से अपनी मनमानी कराने की योजना बना रहे थे, उनकी
सभी योजनाएं धरी रह गईं। बिहार की सभी सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी
खत्रडा करने का मज़ाक़ उत्रडाने वाले तथा बिहार की जनता पर अपना
एकाधिकार समझने वाले नेताओं का यह भ्रम मतदाताओं ने चकनाचूर कर दिया।
बिहार में मतदाताओं के उस निर्णय ने तो वास्तव में सभी को
आश्चर्यचकित कर दिया जिसमें कि हाजीपुर सीट से लोक जनशक्ति पार्टी
अध्यक्ष राम विलास पासवान को हार का मुंह देखना पत्रडा। ज्ञातव्य
है कि राम विलास पासवान इस हाजीपुर सीट से इतने भारी अन्तर से
चुनाव जीत चुके हैं के उनका नाम गिनीज़ बुक में दर्ज हो चुका है। इस
बार भी वे यह कहते सुनाई दिए थे कि उनका चुनाव जीत हार को लेकर नहीं
बल्कि जीत हार के अन्तर को निर्धारित किए जाने को लेकर है। परन्तु
अत्यधिक आत्मविश्वास के उनके सपने भी धराशायी हो गए।नई लोकसभा में
यदि कुछ क्षेत्रीय दलों की स्थिति पर नज़र डालें तो पंजाब का
सत्तारूत्रढ अकाली-भाजपा गठबंधन राज्य की तेरह सीटों में से मात्र
5 सीटें जीतकर संसद में पंजाब का प्रतिनिधित्व कर रहा है। जबकि
हरियाणा का क्षेत्रीय दल इंडियन नेशनल लोकदल राज्य में कांग्रेस का
सूपत्रडा साफ़ करते-करते अपना ही सूपत्रडा साफ़ करा बैठा है। इसे
राज्य में एक सीट पर भी सफलता नहीं मिली। राज्य का ही एक और नवोदित
क्षेत्रीय दल हरियाणा जनहित कांग्रेस चौ0 भजन लाल को केवल इसलिए
विजय दिला पाने में सफल हो सका क्योंकि मतदाताओं ने उनकी
वृध्दावस्था तथा मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की की गई सेवाओं का
बदला चुका दिया। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी
पार्टी दोनों ही को अपेक्षित सीटें प्राप्त नहीं हुईं तथा इन दोनों
ही दलों का ग्राफ़ बहुत तेज़ी से नीचे ढुलक गया। कुछ ऐसी ही स्थिति
बिहार में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ
हुई जिन्हें राज्य में मात्र 4 सीटें प्राप्त हुई। जबकि इनके चौथे
मोर्चे के नए सहयोगी राम विलास पासवान अपना खाता खोल पाने की स्थिति
में भी नहीं रह सके।उपरोक्त हालात इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं
कि कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय एवं देश के सबसे प्राचीन राजनैतिक
संगठन का सूपत्रडा साफ़ करने या इसके नेताओं को अपमानित करने के लिए
तरह-तरह की शब्दावली का प्रयोग करने वाले राजनैतिक दलों विशेषकर
क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को यह बात बख़ूबी सोच लेनी चाहिए कि
सूपत्रडा साफ़ करना मतदाताओं का एकाधिकार है, बत्रडबोले तथा अहंकारी
नेताओं का नहीं। और दूसरे इन क्षेत्रीय दलों के नेताओं को यह भी
ध्यान रखना चाहिए कि यदि कभी सूपत्रडा साफ़ होगा तो वह क्षेत्रीय दलों
का ही हो सकता है, जनादेश 2009 के अनुसार राष्ट्रीय दल का तो
फ़िलहाल नहीं। हरियाणा में इनैलो तथा बिहार में लोजपा की स्थिति तो
कम से कम यही बता रही है। इस बार का जनादेश इस बात की ओर साफ़ इशारा
करता है कि संसदीय चुनावों को लेकर राष्ट्रीय दलों तथा क्षेत्रीय
दलों के अन्तर को मतदाता बख़ूबी समझते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय दलों
के नेताओं को अपनी सीमित सोच तथा अनावश्यक खोखले एवं थोथे शब्दों
का प्रयोग करने के बजाए राष्ट्रकी मुख्यधारा की राजनीति में अपनी
दिलचस्पी दिखानी चाहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि देश के मतदाता
दिन-प्रतिदिन और जागरूक होते जा रहे हैं।
निर्मल रानी |